एक ऐसा शहर जिसकी खुशबू फैली है कई देशों में, लाखों की कीमत में बिकती है खुशबूएं

अगर कही सुगंध की बात हो अब वो फूल की हो, मिट्टी की हो या फिर किसी बेस कीमती इत्र की। सबसे पहले दिमाग में आता है कन्नौज का नाम। शायद बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि सुगंध और खुशबू की परंपरा भी भारत की ही देन है। जिसका जीता जागता प्रमाण है उत्तर प्रदेश का कन्नोज शहर। जहां पांच हजार साल से इत्र बनाने की परंपरा चली आ रही। जिनकी कीमत 50 रूपये से 15 लाख रुपये तक होती है। तो चलिए जानते है कन्नौज के सुगंध की कहानी,..

हजारों साल से इत्र बनाने की वैदिक से आधुनिक प्रथा-:

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वेदों में विदित है कि जब यज्ञ के आयोजन हुआ करते थे जिसमे बलि की आहुति भी हुआ करती थी। मांस की आहुति दिए जाने से पर्यावरण में दुर्गन्ध फैलती थी। इसी समस्या को दूर करने के लिए हवन में अनेक तरह के फूल-पत्तियों समेत सुगन्धित द्रव्यों का इस्तेमाल किया जाने लगा। बस तभी से विभिन्न द्रव्यों से सुगंध निकालने की कला का शुरुआत हुआ। इसके आलावा प्राचीनकाल के आयुर्वेद ग्रंथों में भी इत्र बनाने की प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है।

कनौज के कारीगरों ने ही नूरजहां को दिया था एक विशेष इत्र-:

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इतिहास की बात की जाय तो कन्नौज को इत्र बनाने का तरीक़ा और नुस्खा फारस के कारीगरों से मिला था। कनौज के ही ये कारीगर मलिका ए हुस्न नूरजहां को लॉन्ग लास्टिंग एक विशेष प्रकार का इत्र जो गुलाब से बनाया जाता था, का निर्माण करके दिया था। उस समय से लेकर आज तक इत्र बनाने के तरीकों में कोई विशेष अंतर नहीं आया है। कहते है कन्नौज में बनने वाले इत्र का इतिहास काफी पुराना है, इस इत्र की मांग खाड़ी देशों में काफी ज्यादा है।

रसायन मुक्त होते है कनौज के इत्र-:

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आजकल रासायनिक मिलावट के इत्र बड़े पैमाने में बाजार में बिक रहे है। मगर आज भी अलीगढ़ में उगाये दमश्क गुलाब का, कन्नौज की फैक्ट्री में बना इत्र पूरी दुनिया में मशहूर है। इसके अलावा गेंदा, गुलाब और मेहँदी का इत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध है। कन्नौज के इत्र किसी जमाने में उसी तरह से पसंद किए जाते थे, जैसे आज फ्रांस के ग्रास शहर के इत्र पसंद और उपयोग में लाये जाते हैं।

कई बीमारियों के लिए रामबाण है इत्र-:

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कन्नौज की डिस्टेलेरी में तैयार इत्र पूरी तरह से प्राकृतिक गुणों से भरपूर और एल्कोहल मुक्त रखा जाता है। इसी कारण एक दवा के रूप में कुछ रोग जैसे एंग्जाइटी, नींद न आना और स्ट्रैस जैसे बीमारियों में इत्र की खुश्बू रामबाण का काम करती है।

गुलाब और अदर ऊद इत्र होते है सबसे कीमती-:

आज भी परंपरागत इत्र की खुश्बू जिसमें गुलाब, केवड़ा, बेला, केसर, कस्तूरी, चमेली, मेंहंदी, कदम, गेंदा की खुशबूएं तो पहले वाली शिद्दत से ही पसंद की जाती रही है। इसके आलावा अपनी मिट्टी से प्यार करने वालों के लिए एक विशेष प्रकार का इत्र भी मिट्टी के पके दिए से बनाया जाता है।

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कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिन्हें कोई शायद पहचानता भी नहीं है। जिसमे शमामा, शमाम-तूल-अंबर और मास्क-अंबर जैसे इत्र प्रमुख हैं। सबसे कीमती इत्र अदर ऊद है, जिसे असम की विशेष लकड़ी ‘आसामकीट’ से बनाया जाता है। बाजार में इसकी कीमत 90 लाख प्रति किलो है। इसी प्रकार गुलाब का इत्र भी 12 हज़ार से लेकर साढ़े तीन लाख रुपए, प्रति किलो बिकता है।

लुप्त हो गयी सैकड़ों फैक्ट्रियां-:

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शहर में इत्र बनाने की करीब 200 से ज्यादा फैक्ट्रियां हैं। जिन्हे पूरी तरह से प्राकृतिक गुणों से भरपूर और एल्कोहल मुक्त रखा जाता है। 1990 तक कन्नौज में लगभग 770 से अधिक कारखाने थे जिनकी संख्या अब बहुत कम हो गई है। लेकिन इत्र की खुश्बू को पसंद करने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है ।

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