जब पर्यावरण को बचाने के लिए पेड़ों से चिपकने लगे थे लोग

आज दुनिया की पेड़ों की कटाई चरम पर है.  पेड़ों की कमी से आक्सीजन की कमी, बरसात की कमी समेत कई समस्यों का सामना आज दुनिया के सामने है. जिसके बचाव में आये दिन सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा पेड़ लगाओं अभियान चलाया जाता है. मगर 70 के दशक में ऐसा ही एक बचाव आंदोलन चलाया गया है. जो ऐतिहासिक रहा. Google आज चिपको आंदोलन की 45वीं सालगिरह गूगल डूडल के जरिए याद कर रहा है. तो आईए जानते है चिपको आंदोलन की कुछ खास बाते है..

शांत और अहिंसक विरोध प्रदर्शन कर पेड़ से चिपकने लगे थे लोग 

पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए किया गया एक महत्त्वपूर्ण आन्दोलन था. इस आन्दोलन के अंतर्गत 26 मार्च, 1974 को उत्तराखण्ड (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में चमोली ज़िले के वनों में शांत और अहिंसक विरोध प्रदर्शन किया गया.  जिसे पूरे गांधीवादी तरह से किया गया. बिलकुल शांति से पेड़ों को न काटने का आंदोलन चलाया गया. 70 के दशक में पूरे भारत में जंगलों की कटाई के विरोध में ये आंदोलन शुरू हुआ. जिसे चिपको आंदोलन के नाम से जाना जाता है. इस आंदोलन का नाम चिपको आंदोलन इसलिए पड़ा क्योंकि लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे चिपक या लिपट जाते थे और ठेकेदारों को उन्हें नही काटने देते थे. 1974 में शुरु हुये विश्व विख्यात ‘चिपको आंदोलन’ की प्रणेता गौरा देवी थी. गौरा देवी ‘चिपको वूमन’ के नाम से मशहूर हैं.

आंदोलन में शामिल मुख्य कार्यकर्ता

यह आंदोलन सैकड़ों विकेंद्रित तथा स्थानीय स्वत: स्फूर्त प्रयासों का परिणाम था. इस आंदोलन के नेता सुन्दर लाल बहुगुणा और कार्यकर्ता मुख्यत: ग्रामीण महिलाएँ थीं, जो अपने जीवनयापन के साधन व समुदाय को बचाने के लिए तत्पर थी. पर्यावरणीय विनाश के ख़िलाफ़ शांत अहिंसक विरोध प्रदर्शन इस आंदोलन की अद्वितीय विशेषता थी.

सन 1973 के अप्रैल महीने में ऊपरी अलकनंदा घाटी के मंडल गांव में इसकी शुरूआत हुई और धीरे-धीरे पूरे उत्तरप्रदेश के हिमालय वाले जिलों में फैल गया. बाद में चंडी प्रसाद भट्ट, गोबिंद सिंह रावत, वासवानंद नौटियाल और हयात सिंह जैसे जागरूक लोग भी शामिल हो गए. यह सभी लोग समाज और देश के हीरो थे, उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से हमारे देश की वन संपदा और पर्यावरण की रक्षा की, उनके सम्मान में जितना कहा जाए उतना कम है! लेकिन खास बात यह है कि आज इस आंदोलन में बिश्नोई समाज का बड़ा हाथ था. जोधपुर का महाराजा ने जब पेड़ों को काटने का फैसला सुनाया तो बिशनोई समाज की महिलाएं पेड़ से चिपक गई थी और पेड़ों को काटने नहीं दिया था.

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