जब जलाया गया था नालंदा विश्विद्यालय तब महीनों जलती रही प्राचीनतम किताबें और पांडुलिपियां

बेहद प्राचीनतम विश्वविद्यालय जहां भारत के ही छात्र नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। जहां के पुस्तकालय में हजारों पुस्तकों के आलावा 90 हजार के करीब पांडुलिपियां भी मौजूद थी।

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बख्तियार खिलजी के आक्रमण के दौरान पुस्तकालय में आग लगाए जाने बाद 6 महीनों तक आग सुलगती रही। इसके बावजूद आज भी इस प्राचीनतम विश्विद्यायालय का अस्तित्व कायम है। तो चलिए जानते है इससे जुड़ी कुछ महत्चपूर्ण घटनाएं….

महान चीनी यात्रियों का ज्ञान वर्धक स्थल रहा है-:
गुप्तकालीन सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने 415-454 ई.पूर्व नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की थी। जो बिहार राज्य की राजधानी पटना के एक गांव में है। नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च् शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विश्व विख्यात केन्द्र रहा है।


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महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। यह विश्व का प्रथम पूर्णतःआवासीय विश्वविद्यालय था और विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब 10 ,000 एवं अध्यापकों की संख्या 2 ,000 थी।

प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था तथा प्रसिद्ध ‘बौद्ध सारिपुत्र’ का जन्म यहीं पर हुआ था। इस विश्वविद्यालय की नौवीं सदी से बारहवीं सदी तक अंतरर्राष्ट्रीयख्याति रही।

विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के अंतरर्राष्ट्रीयख्याति एक मुर्ख और अभिमानी तुर्की शासक को रास नहीं और उसने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आग लगवा दी साथ कई ज्ञानी आचार्यों और विद्यार्थियों हत्या करवा दी।

महीनों तक जलती रही प्राचीनतम किताबें और पांडुलिपियां-:
नालंदा विश्वविद्यालय के प्रति तुर्की शासक के क्रुरुरता के पीछे एक कहानी काफी प्रचलित है। कहा जाता है एक बार बख्तियार खिलजी नामक एक तुर्क मुस्लिम लूटेरा बहुत बीमार हो गया। जिसके तमाम हकीमों की दवाई कोई काम नहीं कर रही थी।


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उसके मुस्लिम हकीमों ने उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली मगर वह ठीक नहीं हो सका और मौत के बेहद करीब पहुंच गया था। तभी उसे किसी ने उसको सलाह दी कि नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को बुलाया जाय और उनसे भारतीय विधियों से इलाज कराया जाय।

हालाँकि उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई हिन्दू और भारतीय वैद्य उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और वह किसी काफ़िर (हिन्दू वैध) से उसका इलाज करवाया जाए फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा।

बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी कि मैं एक मुस्लिम हूँ इसीलिए, मैं तुम हिन्दुओं की दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा। बावजूद इसके किसी भी तरह मुझे ठीक करों वर्ना मरने के लिए तैयार रहो। यह सुनकर बेचारे वैद्यराज को रातभर नींद नहीं आई।

उन्होंने बहुत सा उपाय सोचा और सोचने के बाद वे वैद्यराज अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर चले गए और उस बख्तियार खिलजी से कहा कि इस कुरान की 20 पृष्ठ पढ़ लीजिये ठीक हो जायेंगे।

कुरान के पन्नों में छिपी थी खिलजी के ठीक होने की दवाई-:
उसने कुरान पढ़ा और ठीक हो गया। इस घटना और चमत्कार से उसको खुशी नहीं हुई बल्कि बहुत गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है ? बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले उसने 1199 में नालंदा विश्वविद्यालय समेत सभी पुस्तकालयों में आग लगवा दी।

वहां इतनी पुस्तकेंं थीं कि आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकेंं जलती रहीं। उसने हजारों धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले। खिलजी के ठीक होने के जो वजह बताई जाती है वह यह है कि वैद्यराज राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था।

कई धर्मों के लोग पवित्र ग्रंथों को जमीन पर रख के नहीं पढ़ते ना ही कभी, थूक लगा के उसके पृष्ठ को पलटते हैं जबकि मुस्लिम ठीक उलटा करते हैं और वे कुरान के हर पेज को थूक लगा लगा के ही पलटते हैं बस वैद्यराज राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था।

इस तरह वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज के दवा को चाट गया और ठीक हो गया परन्तु उसने इस एहसान का बदला अपने संस्कारों को प्रदर्शित करते हुए नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया।

नालंदा विश्वविद्यालाय के तीन महान् पुस्तकालय थे-:
रत्नोदधि, रत्नसागर रत्नरंजक। इन पुस्तकालयों में सहस्त्रों हस्तलिखित ग्रंथ थे।’ इनमें से अनेकों की प्रतिलिपियां युवानच्वांग ने की थी। जैन ग्रंथ ‘सूत्रकृतांग’ में नालंदा के ‘हस्तियान’ नामक सुंदर उद्यान का वर्णन है।

बख्तियार खिलजी ने नालंदा के जगत् प्रसिद्ध पुस्तकालय को जलाकर भस्मसात कर दिया और यहाँ की सतमंजिली भव्य इमारतों और सुंदर भवनों को नष्ट-भ्रष्ट करके खंडहर बना दिया।

इस प्रकार भारतीय विद्या, संस्कृति और सभ्यता के घर नालंदा को जिसकी सुरक्षा के बारे में संसार की कठोर वास्तविकताओं से दूर रहने वाले यहाँ के भिक्षु विद्वानों ने शायद कभी नहीं सोचा था।

पुस्तकालय भवनों की ऊँचाई का वर्णन करते हुए युवानच्वांग ने लिखा है कि ‘इनकी सतमंजिली अटारियों के शिखर बादलों से भी अधिक ऊँचे थे और इन पर प्रातःकाल की हिम जम जाया करती थी। इनके झरोखों में से सूर्य का सतरंगा प्रकाश अन्दर आकर वातावरण को सुंदर एवं आकर्षक बनाता था।

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