जब एक दर्जी ने कपड़ा सिलाई का काम करते-करते बना दी देश की प्रसिद्ध फिल्में

इंसान में लगन और जज्बा है तो वो कुछ भी कर सकता है. ऐसा ही कुछ कर दिखाया था के. आसिफ ने. जो एक मामूली दर्जी थे. मगर उनकी लगन और जज्बे को आज भी फिल्म इंडस्ट्री सलाम करती है. जी हाँ आज हम आपको देश के एक ऐसे हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक और पटकथा लेखक के बारे में बताने जा रहे है जिन्होंने कपड़े की सिलाई करते करते तीन फिल्मों की रचनाकर इतिहास रच डाला. आज वो हमारे बीच भले ही नहीं मगर उनकी काबिलियत से आज भी प्रेरणा लिया जा सकता है.

मात्र तीन फिल्में बनाकर कर हुए मशहूर 

के. आसिफ़ पूरा नाम करीम आसिफ़ था. जिनका जन्म 14 जून 1922 को उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ था. पिता का नाम डॉ. फ़ज़ल करीम और माँ का नाम बीबी ग़ुलाम फ़ातिमा था. आसिफ़ के बारे कहा जाता है कि वह ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. खुद उन्होंने भी कभी शिक्षित होने का दावा नहीं किया. बावजूद इसके वे महान् फ़िल्मकार बने और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी एक अलग पहचान और जगह क़ायम की.

एक मामूली दर्जी से की कैरियर शुरुआत 

एक मामूली कपड़े सिलने वाले दर्जी के रूप में उन्होंने अपना कैरियर शुरू किया था. बाद में लगन और मेहनत से निर्माता-निर्देशक बन गए. अपने तीस साल के लम्बे फ़िल्म कैरियर में आसिफ़ ने मात्र तीन फ़िल्में बनाई- फूल (1945), हलचल (1951) और मुग़ल-ए-आज़म (1960). ये तीनों ही बड़ी फ़िल्में थीं और तीनों में सितारे भी बड़े थे. ‘फूल’ जहां अपने युग की सबसे बड़ी फ़िल्म थी, वहीं ‘हलचल’ ने भी अपने समय में काफ़ी हलचल मचाई थी और मुग़ल-ए-आज़म तो हिंदी फ़िल्म जगत् इतिहास का शिलालेख है. कहा जाता है आसिफ मोहब्बत को कायनात की सबसे बड़ी दौलत मानते थे. इसी विचार को पर्दे पर लाने के लिए उन्होंने मुग़ल-ए-आज़म का निर्माण किया.

पत्नी सितारा देवी ने दी बे मौत मरने की बद्दुआ 

आसिफ ने नृत्यांगना सितारा देवी से शादी की थी. सितारा देवी भरतनाट्यम के लिए देश-विदेश में मशहूर थीं. रवींद्र नाथ टैगोर ने उन्‍हें नृत्‍य साम्राज्ञी की उपाधि से नवाजा था. बताया जाता है आसिफ एक दिन अभिनेत्री निगार सुल्ताना को सितारा देवी की सौत बना कर घर ले आए. यह उनके दिल पर नागवार गुजरा, पर वह खून का घूंट पीकर रह गईं. पर उनके दिल की मानवता उन्‍हें निगार के बच्‍चों पर प्‍यार लुटाने से रोक नहीं सकी. पर एक बार फिर आसिफ ने दगाबाजी की. इस बार उनकी नजर अपने दोस्‍त की बहन पर ही पड़ गई. उन्‍होंने दिलीप कुमार की बहन को बेगम बना लिया. तब सितारा देवी के सब्र का बांध टूट गया.

सितारा देवी आसिफ को बद्दुआ देते हुए कहा- तुम बेमौत मरोगे और मैं तुम्‍हारा मरा मुंह भी नहीं देखूंगी. हालांकि, यह अलग बात है कि सितारा देवी उतनी बेरहम दिल नहीं रह सकीं. 9 मार्च, 1971 को आसिफ की मौत की खबर जब उन्‍हें अपनी बहन के बेटे से मिली तो वह खुद को रोक नहीं पाईं. वह तुरंत आसिफ के घर गईं और उनके अंतिम दर्शन किए.

बहुत कम फ़िल्में और बहुत ज्यादा प्रसिद्धि हासिल करने वाले फ़िल्मकारों में के. आसिफ़ का नाम शायद अकेला है. आसिफ ने 48 साल की उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह दिया था.

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