सोने की तरह महंगा है यहां पानी, खर्च हो जाती है सरकार की आधी कमाई

सऊदी अरब का नाम दुनिया के उन देशों में शुमार है जो अपने नागरिकों को पानी पर सबसे ज़्यादा सब्सिडी देता है। सऊदी भले अमीर देश है, लेकिन वो खाद्य और पानी के मामले में पूरी तरह से असुरक्षित है। पिछले 50 सालों से सऊदी समंदर के पानी से नमक अलग कर इस्तेमाल कर रहा है। यहां हर साल डिसालिनेशन प्लांट लगाए जाते हैं और अपग्रेड किए जाते हैं।

सऊदी के इस प्राकृतिक समस्या पर किसी ने कहा है यहां सोना है पर पानी नहीं है और सोने की तरह पानी भी महंगा है। बावजूद इसके पानी की समस्याओं से जूझते हुए लोग वहा रहते है। तो आईये जानते सऊदी में भारी जल संकट के बावजूद कैसे रहते है लोग।

प्राकृतिक संसाधनों की कमी कारण कमाई का बड़ा हिस्सा पानी में-:

सऊदी एक इस्लामी राजतंत्र है जिसकी स्थापना 1750 के आसपास सउद द्वारा की गई थी। यहां की धरती रेतीली है तथा जलवायु उष्णकटिबंधीय मरुस्थल। यह विश्व के तेल निर्यातक देशों में गिना जाता है। दुनिया भर के कई देशों को सऊदी तेल बेचकर बेशुमार कमाई कर तो लेता है मगर इस कमाई का बड़ा हिस्सा समंदर के पानी को पीने लायक बनाने में लगाना पड़ जाता है।

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यहां न नदी है न झील। कुंए भी हैं तो तेल के न कि पानी के। पानी के कुंए कई साल पहले ही सूख गए। वर्ष 2011 के आकड़े के मुताबिक सऊदी में पानी की मांग हर साल सात फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है। जिसके लिए सऊदी हर दिन 30.36 लाख क्यूबिक मीटर समुंद्र के खारे पानी को इस्तेमाल करने लायक बनाता है। पानी कम इस्तेमाल किये जाने के लिए सऊदी ने 2015 में ही पानी के व्यावसायिक इस्तेमाल पर टैक्स बढ़ा दिया था।

जल्द ही खत्म हो जाएगा जमीन का पानी-:

कई खोजकर्ताओं का कहना है कि सऊदी अरब का भूमिगत जल अगले कुछ सालों में पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगा। सऊदी अरब में एक भी नदी या झील नहीं है। यहां बारिस भी साल में एक या दो दिन होती है। हज़ारों सालों से सऊदी के लोग पानी के लिए कुंओं पर निर्भर रहे लेकिन बढ़ती आबादी के कारण भूमिगत जल का दोहन बढ़ता गया और इसकी भारपाई प्राकृतिक रूप से हुई नहीं। धीरे-धीरे कुंओं की गहाराई बढ़ती गई और वो वक़्त भी आ गया जब सारे कुंए सूख गए।

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विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अभी अपनी जीडीपी का दो फ़ीसदी पानी की सब्सिडी पर खर्च करता है। इसी रिपोर्ट का कहना है कि 2050 तक मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के देशों को अपनी जीडीपी का छह से 14 फ़ीसदी पानी पर खर्च करना होगा। विश्व बैंक का अनुमान है कि अगले 50 सालों में मीठे पानी के स्रोत ख़त्म हो जाएंगे।

अल्जीरिया, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन, लीबिया, ओमान, फ़लस्तीनी क्षेत्र, क़तर, सऊदी अरब, ट्यूनीशिया, संयुक्त अरब अमीरात और यमन। इन देशों में औसत पानी 1,200 क्यूबिक मीटर है जो कि बाक़ी के दुनिया के औसत पानी 7,000 क्यूबिक मीटर से छह गुना कम है।

क्या होगा विकल्प पानी के लिए ?

समंदर के पानी से नमक को अलग करना एक विकल्प है। इस प्रक्रिया को डिसालिनेशन यानी विलवणीकरण कहा जाता है। दुनिया भर में यह तरीक़ा लोकप्रिय हो रहा है। विश्व बैंक के अनुसार मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के देशों में विलवणनीकरण की प्रक्रिया की क्षमता पूरी दुनिया की आधी है। दुनिया भर के 150 देशों में समंदर के पानी से नमक अलग कर इस्तेमाल किया जा रहा है।

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खाड़ी के देशों में विलणीकरण की प्रक्रिया से पानी घर-घर पहुंचाया जा रहा है। कुछ देशों में पानी की निर्भरता विलवणीकरण पर 90 फ़ीसदी तक पहुंच गई है। मगर पानी की कमी इस तरह से पूरा करना गरीब देशों के लिए यह आसान प्रक्रिया नहीं है।

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सऊदी अरब में पानी का दुसरा और अहम स्रोत अकवीफर्स हैं। जिसके माध्यम से अंडरग्राउंड रूप से जल का संग्रह किया जाता है। 1970 में, सरकार ने अकवीफर्स पर काम शुरू किया था। इसका नतीजा ये हुआ कि देश में हजारों अकवीफर्स बनाए गए। इन्हें शहरी और कृषि दोनों जरूरतों में इस्तेमाल किया जाता है।

समुंद्री जीवों पर बुरा प्रभाव-:

इंटरनेशनल डिसालिनेशन एसोसिएशन (आईडीए) का अनुमान है कि दुनिया भर में 30 करोड़ लोग पानी की रोज़ की ज़रूरते विलवणीकरण से पूरी कर रहे हैं। हालांकि विलवणीकरण की प्रक्रिया भी कम जटिल नहीं है। ऊर्जा की निर्भरता भी इन इलाक़ों में डिसालिनेशन पावर प्लांट पर है। इससे कार्बन का उत्सर्जन होता है। इस प्रक्रिया में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रक्रिया से समुद्री पारिस्थितिकी को नुक़सान पहुंच रहा है।

पेड़ों काटना है अपराध-:

यहां पेड़ काटना बहुत बड़ा जुर्म है। यहां पर सिर्फ खजूर के पेड़ ज्यादा तादात में है। जो यहां का कॉमन पेड़ और फल है। खजूर एक ऐसा फल है जिसमें सब कुछ होता है। लेकिन इसे ज़्यादा खाने से शुगर बढ़ने का ख़तरा रहता है। सऊदी ने अपनी ज़मीन पर गेहूं पैदा करने की कोशिश की थी, लेकिन बहुत महंगा पड़ा था।

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जिसके लिए सऊदी ने गेहूं के लिए खेत का निर्माण किया था। जिसमे सिंचाई के दौरान इतना पानी लगने लगा कि ज़मीन पर नमक फैल गया। कुछ ही सालों में यह ज़मीन पूरी तरह से बंजर हो गई। वो पूरा इलाक़ा ही ज़हरीला हो गया। पूरे इलाक़े को घेर कर रखा गया है ताकि कोई वहां पहुंच नहीं सके।

सब्ज़ी उगाई जाती है लेकिन बहुत ही प्रोटेक्टेड होती है। सऊदी अरब ने जब आधुनिक तौर-तरीक़ों से खेती करना शुरू किया तो उसका भूजल 500 क्यूबिक किलोमीटर नीचे चला गया। खेती के लिए हर साल 21 क्यूबिक किलोमीटर पानी हर साल निकाला गया। निकाले गए पानी की भारपाई नहीं हो पाई।

जलवायु परिर्तन के कारण अरब के देशों पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ रहा है. पूरे मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका पर जल विहीन होने का संकट गहरा रहा है. संभव है कि इंसान पेट्रोल के बिना ज़िंदा रह ले लेकिन पानी के बिना तो मनुष्य अपना अस्तित्व भी नहीं बचा पाएगा और सऊदी अरब इस बात को बख़ूबी समझता है।

स्रोत-BBc.com

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