एक वॉचमन २० साल से भेज रहा है शहीदो के परिवार को खत! जानिये क्यो..

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”ऐ वतन-ऐ वतन हमको तेरी कसम, तेरी राहों में जां तक लुटा जायेंगे, फूल क्या चीज है तेरे कदमों तले भेट अपने सरों की चढ़ा जायेंगे”

ये सिर्फ बस पंक्तियां भर ही नहीं, बल्कि सीमा पर रोज अपनी जान की बाजी लगाने वाले जवानों के शौर्य की दास्ता भी है.

इन लब्जों को अपने होठों पर लेकर जीनेवाले हमारे भारतीय सैनिकों को शत् शत् नमन.
कुछ दिनों पहले जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादियों ने किये आत्मघातक हमले में हमारे सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए.

इस हमले के बाद पुरे देश से आंतकियों और खासकर पाकिस्तान पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग जोर पकड़ी.

इस दौरान देश के हर कोने के नागरिक जवानों के साथ खड़े होते दिखे. लेकिन कोई यह नहीं सोचता की जवानों के प्रति संवेदना व्यक्त करने का यही एक उचित तरीका है? क्या हमारे पास कोई अन्य विकल्प नहीं है?

pulwama attack kuchhnaya
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ये बात इसलिए की हर किसीका व्यक्त होने का तरीका अलग हो सकता है. पर जब भी कोई ऐसी वारदात होती है, तभी हमारी अचानक से जवानों के प्रति प्यार या संवेदना जागृत होती है और ओ भी ज्यादातर आज के दिन सोशल मीडिया तक ही सिमित रह गयी है.

जैसे की सरहद पर सैनिकों की शहादत अब एक आम बात हो चुकी है. चूकि हमें हर घडी यह ध्यान में रखना चाहिए की, सैनिक सीमा पर लड़ रहे हैं इसलिए सारा देश चैन की नींद सो रहा है. देश की रक्षा के लिए भारतीय सैनिक अपना बलिदान दे रहे हैं.

उनके देशभक्ति के ज़ज्बे के आगे हम सब नतमस्तक हैं क्योंकि वो अपना घर परिवार छोड़कर सारे रिश्ते, सगे संबंध ताक पर रखकर देश के प्रति जो जिम्मेदारी निभाते हैं वह काबिले तारीफ है.

हम यहां शांति से जीवन व्यतीत करते हैं. एक साथ मिलकर त्यौहार मनाते हैं. उस समय जवानों का परिवार उनके बिना कैसे रहता होगा इसकी कल्पना करना भी हमारे लिए कठिन है. उन्हें तो यही चिंता हमेशा सताती होगी की उनका बेटा, भाई, पति या पिता घर वापस आयेगा की नहीं.

इतना संघर्षमय जीवन जीने के बावजूद जब भारतीय सैनिक शहीद होते है तब उनका परिवार किस हालत में है ये भी जानने की कोई कोशिश नहीं करता.

कैसे उन शहीदों की पत्नियां अपने मासूम बच्चों के साथ जीवन यापन करती होगी, इससे भी किसी को कोई सरोकार नहीं होता.

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आर्थिक परेशानी के चलते उनके परिवार खस्ते में जीवन बिताते है क्यूंकि कमाने वाला प्रमुख व्यक्ति देश के लिए कुर्बान हो चूका होता है. उनके परिवार के धैर्य और हौसले की भी हम कदर करते हैं.

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते है जो बस संवेदना, कदर या भावना व्यक्त करने से परे जाकर अपनी-अपनी हैसियत से समाज के प्रति अपना योगदान देते है. कोई समाज सेवा करता है तो कोई गरीबों की मदद.

ऐसी ही एक अलग और अनोखी शख्सियत हैं राजस्थान के भरतपुर जिले के रहने वाले जीतेंद्र सिंह गुर्जर. इनकी कई पीढ़ीयां भारतीय सेना में रह चुकी हैं. चूकि जितेंद्र के पिता भी भारतीय सेना में थे तो जाहिर सी बात है की जितेंद्र को भी देशभक्ति के पाठ उनके घर से ही मिले होंगे.

मगर शारीरिक परीक्षा में फेल होने के कारण उनका भरतीय सेना में चयन नहीं हो सका जिसका उन्हें बेहद अफ़सोस है.

लेकिन इस बात को उन्होंने अपनी देशभक्ति के आड़े नहीं आने दिया. 37 वर्ष आयु के जितेंद्र एक अलग तरीके से अपनी देशभक्ति निभाते हैं.

एक दिन अचानक उनके मन में खयाल आया की, जब भारतीय सैनिक सीमा पर से अपने परिवार को खत लिखता है, तो उस खत का एक-एक शब्द उस परिवार को कितना आत्मिक सुख देता होगा.

बस यह सोचकर जितेंद्र ने 1999 के कारगिल युद्ध के बाद शहीदों के परिवार को सांत्वना देने के लिये और उनका मनोबल बढ़ाने के लिये खत लिखने का सिलसिला शुरू किया.

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अभी तक उन्होंने 4000 शहीदों के परिवार को भावनिक आधार देने के लिए खत लिखे. जिसमे से 125 से अधिक लोगों के जवाब भी मिले.

इतना ही नहीं बल्कि जितेंद्र अखबारों में छपी शहीदों की खबरों के आधार पर जानकारी जमा कर उनके चित्र भी सहेज कर रखते हैं. उन्होंने अपने घर पर शहीद संग्रह बनाया है.

कभी-कभी शहीदों के गांव जाकर उनके स्मारकों की मिट्टी भी लाते हैं. अभी तक 30,000 से ज्यादा परिवारों की जानकारी उनके पास है.

जितेंद्र का मानना है की, वह इन परिवारों की आर्थिक मदद तो नहीं कर सकते. पर खत लिखकर उनका मनोबल तो बढ़ा ही सकते हैं. इससे इन परिवारों से उनका अपनापन का रिश्ता कायम हो गया है. कई परिवार तो उन्हें अपना बेटा ही मानते हैं.

गौरतलब है की, जितेंद्र की पत्नी उनके इस प्रयत्न से खुश नहीं हैं. उन्हें लगता है की ये पागलपन है.

जितेंद्र ने अभी तक 9 क्विंटल स्टेशनरी जमा कर रखी है. हालाकी जितेंद्र जिस फर्म में सुरक्षा गार्ड का काम करते हैं, वहां उनकी तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं है. पर फिर भी उनका जुनून वैसे ही कायम है.

पहले एक पोस्टकार्ड की कीमत 15 पैसे ही थी जो अब बढ़ गयी है. जितेंद्र ने सरकार से पोस्टकार्ड की कीमत कम करने के लिये आवेदन भी दिया था जो स्वीकार ना हो सका.

जितेंद्र पोस्ट कार्ड पर तिरंगे को चित्रित कर एक जगह पर सत्यमेव जयते भी लिखते हैं. साथ ही थोड़ी कविता और शेरो शायरी के माध्यम से परिवारों का मनोबल बढ़ाने की कोशिश करते है.

जितेंद्र का बेटा अभी 9 वीं कक्षा में पढ़ रहा है. जितेंद्र उसे भरतीय सेना में भेजना चाहते हैं. ईश्वर करे उनकी ये इच्छा पूरी हो.


इस बात से हमें ये समझने में मदद हो सकती है की, केवल देश के लिए जान न्यौंछावर करना ही देशभक्ति नहीं हैं. बल्कि अगर आप किसी रोते हुए चेहरे पर मुस्कान ला सके तो वो भी किसी देशभक्ति से कम नहीं. इसलिए जितेंद्र के इस ज़ज्बे को तहे दिल से सलाम…

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