जानिए आखिर कौन थे लेनिन जिनकी प्रतिमा तोड़े जाने पर मचा है घमासान

त्रिपुरा में हुए विधानसभा चुनाव के बाद केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए राज्य की सत्ता पर काबिज पाते हुए करीब 25 साल पुरानी लेफ्ट सत्ता को उखाड़ फेंका. लेकिन दूसरी तरफ़ ऐसे भी लोग थे जो ये कह रहे थे कि इस तरह किसी चुनावी जीत के बाद प्रतिमा को गिराया जाना सही नहीं है.

तो वही दूसरी ओर त्रिपुरा में रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन की मूर्ति को ढहाने के बाद काफी तनाव उत्पन्न हो गया है. वामपंथी दलों ने इस बात के लिए बीजेपी को कोसा है और हिंसा की राजनीति का आरोप लगाया है. चलिए जानते हैं कि व्लादिमीर लेनिन थे कौन, जिनकी प्रतिमा को तोड़ने पर पूरे त्रिपुरा में बवाल मचा है..

रूस क्रांति के नायक व्लादिमीर इलीइच लेनिन

Vladimir Ilich Ulyyanov lenin

व्लादिमीर इलीइच लेनिन (1870-1924) रूस में बोल्शेविक क्रांति का नेता एवं रूस में साम्यवादी शासन का संस्थापक थे, जिनका जन्म सिंविर्स्क नामक स्थान में हुआ था और उनका वास्तविक नाम ‘उल्यानोव था. ये शुरू से ही क्रांतिकारी के रूप में जाने जाते थे. बताया जाता है कि उच्च योग्यता के साथ स्नातक बनने पर लेनिन ने 1887 में कज़ान विश्वविद्यालय के विधि विभाग में प्रवेश लिया था लेकिन शीघ्र ही विद्यार्थियों के क्रांतिकारी प्रदर्शन में हिस्सा लेने के कारण विश्वविद्यालय ने निष्कासित कर दिया गया.

साइबेरिया में उनकी शादी नदेज़्हदा क्रुपस्काया से हुई. साल 1901 में व्लादिमीर इलिच उल्यानोव ने लेनिन नाम अपनाया. इस निर्वासन के बाद उन्होंने क़रीब 15 साल पश्चिमी यूरोप में गुज़ारे जहां वो अंतरराष्ट्रीय रिवॉल्यूशनरी आंदोलन में अहम भूमिका निभाने लगे और रशियन सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी के ‘बॉल्शेविक’ धड़े के नेता बन गए.
साल 1889 में उन्होंने स्थानीय मार्क्सवादियों का संगठन बनाया था और उसके बाद वो मार्क्सवादियों के एक बड़े नेता के रूप में उभरे, जिसके चलते उन्हें रूसी क्रांति के दौरान जेल भी जाना पड़ा था. उन्होंने रूसी क्रांति पर तीस से ज्यादा किताबें भी लिखी हैं.

मजदूरों के हक़ के लिए क्रांति 

मार्क्सवादी विचारक लेनिन के नेतृत्व में 1917 में रूस की क्रांति हुई था. लेनिन की अध्यक्षता में सोवियत सरकार की स्थापना की गई थी. प्रारंभ से ही सोवियत शासन ने शांतिस्थापना पर बल देना शुरू किया. जर्मनी के साथ उसने संधि कर ली. जमींदारों से भूमि छीनकर सारी भूसंपत्ति पर राष्ट्र का स्वामित्व स्थापित कर दिया गया.

व्यवसायों तथा कारखानों पर श्रमिकों का नियंत्रण हो गया और बैकों तथा परिवहन साधनों का राष्ट्रीकरण कर दिया गया. जिससे श्रमिकों और किसानों को पूंजीपतियों और जमींदारों से छुटकारा मिला और समस्त देश के निवासियों में पूर्ण समता स्थापित कर दी गई. लेनिन ने इस दौरान “दि इमीडिएट टास्क्स ऑफ दि सोवियत गवर्नमेंट” तथा “दि प्रोले टेरियन रिवाल्यूशन ऐंड दि रेनीगेड कौत्स्की” नामक पुस्तकें लिखीं (1918).

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जिसमे लेनिन ने बतलाया कि मजदूर भी एक इंसान होते हैं और उन्हें भी सम्मान के साथ जीने का हक है. रूसी कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक पार्टी) के संस्थापक लेनिन के मार्क्सवादी विचारों को ‘लेनिनवाद’ के नाम से जाना जाता है. ये रूसी क्रांति थी, जिसने रूस का भविष्य बदल दिया.

लेनिन के विचारों से प्रभावित थे भगत सिंह 

‘भगत सिंह को अंग्रेज़ सल्तनत ने लाहौर में फाँसी दी. बाद में भगत के परिवार को उनका शरीर नहीं दिया. जंगलों में जाकर मिट्टी के तेल से भगत सिंह का शरीर जला दिया था. उस जगह एक स्मारक बना है. मैं जब वहां गया था, मैंने रोमांच का अनुभव किया था.’

2014 आम चुनावों से पहले से लेकर अब तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में कई बार भगत सिंह को याद करते रहे हैं. भगत सिंह, जिन पर रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन का प्रभाव रहा. लेकिन भगत सिंह को प्रभावित करने वाले लेनिन त्रिपुरा में चुनाव जीती बीजेपी के कुछ समर्थकों को अखर रहे हैं.

ये विडंबना ही है कि लेनिन की प्रतिमा गिराने का जश्न बीजेपी मना रही है और मोदी लेनिन से प्रभावित रहे भगत सिंह का ज़िक्र आए दिन करते रहते हैं. इसका एक ज़िक्र कुलदीप नैय्यर की किताब ‘द मार्टिर: भगत सिंह-एक्सपेरीमेंट्स इन रेवोल्यूशन’ में मिलता है.

किताब के मुताबिक, ”21 जनवरी , 1930 को अभियुक्त अदालत में लाल स्कार्व पहनकर पहुंचे. जैसे ही मेजिस्ट्रेट कुर्सी पर बैठे, उन्होंने ‘लेनिन ज़िदाबाद’ के नारे लगाने शुरू कर दिए. इसके बाद भगत सिंह ने एक टेलिग्राम पढ़ा जिसे वो लेनिन को भेजना चाहते थे. टेलिग्राम में लिखा था, ”लेनिन दिवस पर हम उन सभी लोगों को दिली अभिभादन भेजते हैं जो महान लेनिन के विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं. हम रूस में चल रहे महान प्रयोग की कामयाबी की कामना करते हैं.”भगत सिंह

जब अंतिम समय में भगत सिंह ने लेनिन की लिखी पुस्तक पढ़ी 

भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे. उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हें किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.

मीडिया ख़बरों के मुताबिक साल 2013, 2014 में यूक्रेन में लेनिन की प्रतिमा गिराई गई थी. प्रतिमा गिराने का आरोप यूक्रेन के राष्ट्रवादियों पर था. दिल्ली के नेहरू पार्क में भी लेनिन की एक प्रतिमा है. इसके अलावा भारत के कुछ राज्यों में भी लेनिन की प्रतिमा है.

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