जानिए आखिर क्यों गायब होने लगी गौरया, पौराणिक मान्यताओं में शुभ मानी गयी है ये नन्ही सी चिड़िया

एक वक्त था जब हमारे कानों में सुबह की पहली किरण के साथ ही बहुत मीठी आवाजें पड़ती थीं। ये चिड़ियों की आवाज थी और इन्हें भारत में गौरैया के नाम से जाना जाता है। वक्त बदला और तेज रफ्तार देश-दुनिया में गौरैया की आबादी कम होती चली गई। एक अनुमान के मुताबिक, शहरों में तो इनकी तादाद महज 20 फीसदी रह गई है। हमारे घर-आंगन में फुदकने वाली गौरैया कहीं गुम हो गई है। जिसकी चहचहाहट में प्रकृति का संगीत सुनाई देता था वो अब मुश्किल से दिखाई देती है। कहां गई और क्यों गई गौरैया?

धार्मिक महत्त्व

भारतीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गौरया जिस भी घर में या उसके आंगन में रहती है वहां सुख और शांति बनी रहती है. खुशियां उनके द्वार पर हमेशा खड़ी रहती है और वह घर दिनोंदिन तरक्की करता रहता है. इसके अलावा भी हिंदू धर्म में ऐसे और भी पक्षी हैं जिनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है. पक्षियों को हिंदू धर्म में देवता और पितर माना गया है. कहते हैं जिस दिन आकाश से पक्षी लुप्त हो जाएंगे उस दिन धरती से मनुष्य भी लुप्त हो जाएगा. किसी भी पक्षी को मारना अपने पितरों को मारना माना गया है.

 

बिहार की राजकीय पक्षी है गौरैया

बिहार में गौरैया को संरक्षण देने के उद्देश्य से इसे राजकीय पक्षी घोषित किया गया है. कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से गौरैया नाम से पत्रिका भी प्रकाशित की जाती है. बिहार के साथ कुछ अन्य राज्यों ने भी गौरैया को राजकीय पक्षी घोषित किया है, लेकिन सभी जगह गौरैया का वही हश्र है. कोई खास या बड़ी पहल अब तक नहीं दिखाई दी है.

अत्याधुनिक विकास से गायब हो रही गौरया 

अकसर घरों में गौरैया उड़ती रहतीं थीं. फिर छतों पर सीलिंग फैन लटकने लगे. हमारी ये सुविधा इस खूबसूरत पक्षी के लिए जानलेवा साबित होने लगी. घरों में बेफिक्री से परवाज भरने वाली गौरैया सीलिंग फैन से टकरा-टकरा कर जान देने लगीं.

एक बंद कमरे कैद होते लोग

गांवों में तो आज भी आंगन हैं. लेकिन, शहरों में ये खत्म होने लगे हैं. पहले दाना चुगने ये आंगन में उतरती थीं. छोटे बर्तनों में इनके लिए दाना और पानी रखा जाता था. अब जिंदगी में भागमभाग है. इनके लिए शायद बहुत कम लोगों के पास वक्त बचा है. गांव या खुली जगहों पर तो ये जी लेती हैं पर शहरों में नहीं.

इलेक्ट्रानिक तरंगे भी जिम्मेदार 

एक रिसर्च के मुताबिक, जैसे-जैसे मोबाइल टॉवर की तादाद बढ़ती गई, वैसे-वैसे गौरैया कम होती गईं. दरअसल, ऐसा दावा है कि इन टॉवर्स से जो तरंगें निकलती हैं, वो गौरैया की प्रजनन क्षमता को कम करती है.

आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक और पक्षी वैज्ञानिकों की मानें तो गौरैया की संख्या 60 से 80 फीसद तक कम हो गई है. इस चिंताजनक स्थिति को देखते हुए साल 2010 में 20 मार्च को पहली बार गौरैया दिवस मनाया गया. ताकि लोगों को इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके.

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