छुआछूत की लड़ाई थी कोरेगांव युद्ध

महाराष्ट्र के पुणे जिले में भीमा कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह के दौरान एक जनवरी २०१८ को हुई हिंसा की वजह से महाराष्ट्र एक बार फिर जातिगत तनाव के मुहाने पर खड़ा रहा. महाराष्ट्र में दलितों और मराठा समुदाय के बीच हुए jराज्य सरकार द्वारा दलितों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा रोकने में विफल रहने पर तीन जनवरी को एक राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया गया है. जिसका असर मुंबई की रेलसेवा, बस, समेत कई जगहों पर देखने को मिला. पर क्या आप जानते है कोरे गांव भीमा लड़ाई कांड. नहीं जानते तो चलिए नजर डालते है इस युद्ध के इतिहास पर…!

koreganv kuchhnaya

कोरेगाँव की लड़ाई १ जनवरी १८१८ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के पेशवा गुट के बीच, कोरेगाँव भीमा में लड़ी गई थी. जो बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में २८ हजार मराठों को पुणे पर आक्रमण करना था. रास्ते में उनका सामना कंपनी की सैन्य शक्ति को मजबूत करने पुणे जा रही एक ८०० सैनिकों की टुकड़ी से हो गया. पेशवा ने कोरेगाँव में तैनात इस कंपनी बल पर हमला करने के लिए २ हजार सैनिक भेजे. कप्तान फ्रांसिस स्टौण्टन के नेतृत्व में कंपनी के सैनिक लगभग १२ घंटे तक डटे रहे. अन्ततः जनरल जोसेफ स्मिथ की अगुवाई में एक बड़ी ब्रिटिश सेना के आगमन की संभावना के कारण मराठा सैन्यदल पीछे हट गए. अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का ये एक और उदाहरण था.

जब ५०० महारों ने 28 हजार पेशवा सेना को चटाई धूल

mahar-regiment-ambedkar kuchhnaya
samaybuddha.files.wordpress.com

‘भीमा नदी’ के तट पर बसा गाँव भीमा – कोरेगांव पुणे ( महाराष्ट्र ) की कहानी 01 जनवरी 1818 का ‘ठंडा’ दिन दो ‘सेनाएं’ आमने – सामने 28000 सैनिकों सहित पेशवा बाजीराव द्वितीय के विरूद्ध बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री के 500 महार सैनिक ब्राह्मण राज बचाने की फिराक में पेशवा और दूसरी तरफ पेशवाओं के पशुवत ‘अत्याचारों’ का ‘बदला’ चुकाने की ‘फिराक’ में गुस्से से तमतमाए 500 महार के बीच घमासान युद्ध हुआ. जिसमे पेशवा’ की शर्मनाक ‘पराजय’ हुई. पेशवा बाजीराव का एक जनवरी 1818 में ईस्ट इण्डिया कंपनी के साथ कोरेगांव के पास अंतिम युद्ध हुआ. इस युद्ध में पेशवा बाजीराव को पकड़ कर कंपनी की सेना ने मार कर पेशवा राज्य समाप्त कर उस पर अधिकार कर लिए और अछूतो को बहुत हद तक राहत मिली.

दलित और ब्राह्मणों के बीच थे भेदभाव जिसका फायदा उठाया अंग्रेजों ने

कई इतिहासकार इसे दलित बनाम ब्राह्मणों की लड़ाई मानते हैं जिसमें दलितों ने अग्रेजों के सहयोग से ब्राह्मणों को शिकस्त दी. इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके प्रदूषित और अपवित्र पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ.उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण प्रदूषित और अपवित्र न हो जाए.

mahar kuchhnaya

कोरेगांव भीमा का दूसरा पक्ष भी है. इतिहासकारों का दावा है कि महारों ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों को हराया था. ब्राह्मणों ने छुआछूत जबरन दलितों पर थोप दिया था और वो इससे नाराज़ थे. जब महारों ने ब्राह्मणों से इसे ख़त्म करने को कहा तो वे नहीं माने और इसी वजह से वो ब्रिटिश फ़ौज से मिल गए. ब्रिटिश फ़ौज ने महारों को ट्रेनिंग दी और पेशवाई के ख़िलाफ़ लड़ने की प्रेरणा दी. मराठा शक्ति के नाम पर जो ब्राह्मणों की पेशवाई थी ये लड़ाई दरअसल, उनके ख़िलाफ़ थी और महारों ने उन्हें हराया. ये मराठों के ख़िलाफ़ लड़ाई तो कतई नहीं थी. मराठों का नाम इसमें इसलिए लाया जाता है क्योंकि ब्राह्मणों ने मराठों से पेशवाई छीनी थी. ये आखिरी पेशवा ताकत थी और ब्रिटिश उन्हें हराना चाहते थे. इसीलिए ब्रितानी फ़ौज ने महारों को साथ लिया और पेशवा राज ख़त्म कर दिया.

bramhan peshavai kuchhnaya
ichef-1.bbci.co.uk

जेम्स ग्रांट डफ़ ने अपनी किताब ए हिस्टरी ऑफ़ द मराठाज़ में इस लड़ाई का ज़िक्र किया है. इसमें लिखा है कि रात भर चलने के बाद नए साल की सुबह दस बजे भीमा के किनारे पहुंचे जहां उन्होंने करीब 25 हज़ार मराठों को रोके रखा. वो नदी की तरफ़ मार्च करते रहे और पेशवा के सैनिकों को लगा कि वो पार करना चाहते हैं लेकिन जैसे ही उन्होंने गांव के आसपास का हिस्सा कब्ज़ाया, उसे पोस्ट में तब्दील कर दिया.

ichef-1.bbci.co.uk

हेनरी टी प्रिंसेप की किताब हिस्टरी ऑफ़ द पॉलिटिकल एंड मिलिट्री ट्रांजैक्शंस इन इंडिया में इस लड़ाई में महार दलितों से सजी अंग्रेज़ टुकड़ी के साहस का ज़िक्र मिलता है. इस किताब में लिखा है कि कप्तान स्टॉन्टन की अगुवाई में जब ये टुकड़ी पूना जा रही थी, तो उस पर हमला होने की आशंका थी. खुली जगह पर फंसने के डर से बचने के लिए इस टुकड़ी ने कोरेगांव में पहुंचकर उसे अपना किला बनाने का फ़ैसला किया. अगर ये टुकड़ी खुले में फंस जाती तो मराठों के हाथों बुरे हालात में फंस सकती थी. इस लड़ाई में 834 कंपनी फ़ौजियों में से 275 मारे गए, घायल हुए या फिर लापता हो गए. इनमें दो अफ़सर भी शामिल थे. इंफ़ैंट्री के 50 लोग मारे गए और 105 ज़ख़्मी हुए.

koreganv kuchhnaya

अब एक बार फिर से ये आग जल उठी है. जिसकी आंच झुलस रहे है लोग. हाल ही में दलितों और मराठा समुदाय के बीच कई जगह हिंसक झड़पें होने की ख़बरें हैं. इन झड़पों की शुरुआत कोरेगांव भीमा, पाबल और शिकरापुर से हुई, जहां बवाल में कथित रूप से एक व्यक्ति की मौत हो गई. राज्य के मुख्यमंत्री हिंसा में मारे गए युवक के परिजनों को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा और उसकी मौत की जांच सीआईडी करेगी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *