भारत का एक ऐसा क्रांतिकारी जिसकी फांसी के वक्त जल्लाद के छूट गए पसीने, छह बार टूटा फंदा

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आध्यात्मिक घटनाओं पर आज यकीन करना ज्यादातर लोग अंधविश्वास ही मानते है. खासकर वैज्ञानिक विचार धारा के लोग. मगर दुनिया भर में ऐसी कई घटनाएं देखने या सुनने को मिलती है, जिनपर यकीन करना ही पड़ता है.

ऐसी ही एक घटना है मां तरकुलही की, जिन्होंने 1857 के एक क्रांतिकारी को फांसी पर लटकने से छह बार बचाया था.

जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत को माता से मिन्नतें करने पड़ी. तब जाकर फांसी की प्रक्रिया पूरी की जा सकी. तो आईये जानते है पूरी घटाना क्या थी…!

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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से 20 किलोमीटर दूर देवीपुर गांव में मां तरकुलही का यह प्रसिद्ध मंदिर स्थित है. जिसका अस्तित्व स्वतंत्रता संग्राम से पहले से है. इस मंदिर से जुड़ी एक घटना सदियों से प्रचलित है और वो वह है डुमरी रियासत के क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह का फांसी के दौरान हर बार बचना. तो चलिए जान लेते है उस घटना के बारे में.

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दरअसल अंग्रेज भारतीयों पर बहुत अत्याचार करते थे. डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह बहुत बड़े देशभक्त थे. वह अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक चुके थे.

बंधु सिंह मां के भी बहुत बड़े भक्त थे. 1857 के आसपास की यह बात है, जब पूरे देश में आजादी की पहली हुंकार देश में उठी. गोरिल्ला युद्ध में माहिर बाबू बंधू सिंह भी उसमें शामिल हो गए. वह घने जंगल में अपना ठिकाना बनाए हुए थे.

जंगल घना था. जंगल से ही गुर्रा नदी गुजरती थी. उसी जंगल में बंधु एक तरकुल के पेड़ के नीचे पिंडियों को बनाकर मां भगवती की पूजा करते थे. बंधु अंग्रेजों से गुरिल्ला युद्ध लड़ते और मां के चरणों में उनकी बलि चढ़ाते जिसकी भनक अंग्रेजों को लग गई.

उन्होंने अपने गुप्तचर लगाए. अंग्रेजों की चाल कामयाब हुई और एक गद्दार ने बाबू बंधू सिंह के गुरिल्ला युद्ध और बलि के बारे में जानकारी अंग्रेजों को दे दी. फिर अंग्रेजों ने जाल बिछाकर वीर सेनानी को पकड़ लिया.

छह बार टूटा फांसी का फंदा

तरकुलही देवी के भक्त बाबू बंधु सिंह पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया. अंग्रेजी जज ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई. फिर उनको सार्वजनिक रूप से फांसी देने का फैसला लिया गया, ताकि कोई फिर बगावत न कर सके.

12 अगस्त 1857 को पूरी तैयारी कर बाबू बंधु सिंह के गले में जल्लाद ने जैसे ही फंदा डालकर लीवर खींचा तो फंदा ही टूट गया.

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छह बार जल्लाद ने फांसी पर उनको चढ़ाया, लेकिन हर बार मजबूत से मजबूत फंदा टूटता गया. अंग्रेज परेशान हो गए. जल्लाद भी पसीनेे-पसीने होने लगा. जल्लाद गिड़गिड़ाने लगा कि, अगर वह फांसी नहीं दे सका, तो उसे अंग्रेज फांसी पर चढ़ा देंगे.

इसके बाद बंधु सिंह ने मां तरकुलही से गुहार लगाकर प्रार्थना की, कि उनको फांसी पर चढ़ जाने दें. उनकी प्रार्थना के बाद सातवीं बार जल्लाद ने जब फांसी पर चढ़ाया, तो उनकी फांसी हो सकी. बंधु सिंह का जन्म 1 मई 1833 को डुमरी रियासत के बाबू शिव प्रसाद सिंह के एक जमींदार परिवार में हुआ था.

इस घटना के बाद मां तरकुलही का महात्म दूर दराज तक पहुंचा और धीरे-धीरे भक्तों का रेला वहां पहुंचने लगा.

प्रसाद में बनता है बकरे का मांस

मां तरकुलही मंदिर में बकरा चढ़ाने की परम्परा है. लोग मन्नते मांगने आते हैं और पूरी होने के बाद यहां बकरे की बलि चढ़ाते हैं. फिर वहीं मिट्टी के बर्तन में उसे बनाते हैं और प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते हैं.

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घने जंगलो में विराजमान तरकुलही माई का दरबार अब हर साल आने वाले हजारों लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का तीर्थ बन चुका है.

लोगों का मानना है की, तरकुल के पेड़ के नीचे विराज माता का भव्य मंदिर सबकी मुरादें पूरी कर रहा है.

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हर साल लाखों श्रद्धालु मां का आशीर्वाद पाने के लिए आते हैं. इस मंदिर के महात्म के बारे में लोग बताते हैं, कि मन से जो भी मुराद मांगी जाए तो वह पूरी होती हैं. दूर दराज से आए भक्त मां से मन्नतें मांगते हैं.

चूकि मन्नते पूरी होने के बाद यहां मंदिर में घंटी बांधने की परम्परा है. मंदिर परिसर में चारों ओर घंटियां ही घंटियां देखने को मिलती है. वैसे तो यहां आने वालों का तांता लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि में विशेष रूप से आस्थावान श्रद्धालु यहां आते हैं.

स्रोत-पत्रिका, Baaghi42

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