पूरी के जगन्नाथ मंदिर के कई चमत्कारी रहस्य, मंदिर में प्रवेश करते होता ये सबकुछ..!

एक ऐसा मंदिर जिसे खुद भगवान ने निर्मित कराया। जिसमे आज भी ऐसे कई रहस्य है जिसे कोई समझ नहीं पाया। इस मंदिर में विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध है। जी हां हम बात कर रहे है उस मंदिर की जहां भगवान विष्णु बद्रीनाथ में स्नान करके, द्वारिका में वस्त्र बदलकर भोजन के लिए पुरी में जगन्नाथ मंदिर आते है और विश्राम के लिए रामेश्‍वरम चले जाते है। आज इस लेख में हम आपको इस मंदिर के निर्माण और चमत्कार से रुबरु करवा रहे है जो आज भी रहस्य बना हुआ है।

पुराणों में मिलते मंदिर के प्रमाण-:

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पुराणों में पुरी को धरती का वैकुंठ कहा गया है। इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। इस मंदिर का निर्माण 2 ईसा पूर्व हुआ था। वर्तमान में जो मंदिर है वह 7वीं सदी में बनवाया गया था। यहां स्थित मंदिर 3 बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिसा शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं।

सपने में आकर भगवान विष्णु ने कहां-:

पुरी के इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक रोचक कहानी है। मालवा के राजा इंद्रदयुम्न के लंबी तपस्या के बाद जब भगवान विष्णु के सपने में आने के बाद मंदिर का निर्माण करवाया था। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है उसे नीलमाधव कहते हैं। ‍

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तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा के सेवको ने मूर्ति की तलाश शुरु कर दी। अंत में पता चला कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है।

छल से चुराया नीलमाधव की प्रतिमा-:

राजा का सेवक ब्राह्मण विद्यापति सबर कबीले के मुखिया की बेटी से विवाह कर नीलमाधव की मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी। विश्‍ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दुखी हुआ। अपने भक्त के दुख से भगवान भी दुखी हो गए। भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राजा इंद्रदयुम्न से वादा किया कि वो एक दिन उनके पास जरूर लौटेंगे बशर्ते कि वो एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे।

राजा ने मंदिर का निर्माण करवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा। भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है।

राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्‍ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए।

भेष बदलकर आये भगवान विश्कर्मा, अधूरी रह गयी प्रतिमा-:

अब बारी थी लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे।

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कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रदयुम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया।

जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें 3 अधूरी ‍मूर्तियां मिली पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

हवा के विपरीत लहराता ध्वज-:

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जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा किस कारण होता है यह आज भी रहस्य बना है। यह भी आश्‍चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं। ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ है।

गुंबद की परछाई नहीं बनती-:

यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय दिखाई नहीं देती।

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इसके अलावा मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि देखा गया है कि भारत के अधिकतर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आते हैं।

चौकाने वाला चमत्कारिक सुदर्शन चक्र-:

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पुरी में किसी भी स्थान से मंदिर के मुख्य गुंबज पर लगे सुदर्शन चक्र को देखने पर वह सदैव सामने ही लगा दिखाई देता है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है।

जमीन से समुद्र की और बहती है हवाएं-:

सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है। अधिकतर समुद्री तटों पर आमतौर पर हवा समुद्र से जमीन की ओर आती है, लेकिन यहां हवा जमीन से समुद्र की ओर जाती है।

चमत्कारी तरीके से पकते है प्रसाद-:

भगवान जगन्नाथ के छप्पन भोग के लिए मंदिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर माना गया है। जहां 500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ भगवान जगन्नाथजी का प्रसाद बनाते हैं। कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों न बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है। मंदिर के अंदर प्रसाद पकाने के लिए सामग्री पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती।

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मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर के बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है। किसी चमत्कार से कम नहीं है।

न लहरों की आवाज सुनाई देती है और न ही शवों के जलने की गंध आती-:

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मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर समुंद्री लहरों की आवाज नहीं सुनाई देती। इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।
इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है, जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी।

हनुमानजी की एक आदत से तीन बार टूटा मंदिर-:

माना जाता है कि 3 बार समुद्र ने जगन्नाथजी के मंदिर को तोड़ दिया था। कहते हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ ने वीर मारुति (हनुमानजी) को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, लेकिन जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के लिए खुद को रोक नहीं पाते थे।

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हनुमान दर्शन के लिए जाते तो उनके पीछे समुंद्र आ जाता था। जिससे मंदिर को क्षति पहुंचती थी। हनुमान की इस आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमानजी को यहां स्वर्ण बेड़ी से जकड़ दिया गया। तब से सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। भक्त लोग बेड़ी में जगड़े हनुमानजी के दर्शन करने के लिए आते हैं।

महान हस्तियों किया है प्रभु के दर्शन-:

पांच पांडव भी अज्ञातवास के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने आए थे। मंदिर के अंदर पांडवों का स्थान अब भी मौजूद है। कहते हैं कि ईसा मसीह सिल्क रूट से होते हुए जब कश्मीर आए थे तब पुन: बेथलेहम जाते वक्त उन्होंने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए थे। 9वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने यहां की यात्रा की थी और यहां पर उन्होंने चार मठों में से एक गोवर्धन मठ की स्थापना की थी।

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महान सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह ने इस मंदिर को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण दान किया था, जो कि उनके द्वारा स्वर्ण मंदिर, अमृतसर को दिए गए स्वर्ण से कहीं अधिक था। इस मंदिर में गैर-भारतीय धर्म के लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित है। माना जाता है कि ये प्रतिबंध कई विदेशियों द्वारा मंदिर और निकटवर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ और हमलों के कारण लगाए गए हैं।

स्रोत-वेब दुनिया, विकिपीडिया

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