…तो देश के सबसे प्रतिष्ठित MBA कालेज में हिंदी का हो रहा विरोध

हिंदुस्तान में हिंदी का अपमान सालों से चला आ रहा है. देश में कोई हिंदी बोलने से कतराता है तो लिखने से. एक ऐसा ही मामला सामने आया है देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएम जहाँ के छात्रों ने हिंदी में अपना नाम लिखने का विरोध कर रहे है.

डिग्री पर हिंदी में नाम लिखना चाहता हैं संस्थान 

दरअसल आईआईएम (भारतीय प्रबंधन संस्थान) को एमबीए की पढ़ाई के लिए देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में जाना जाता है. आईआईएम बेंगलुरू ने छात्रों को उनकी पोस्टग्रैजुएट डिग्री हिन्दी में भी बांटने की तैयारी कर रहा था. इस बाबत आईआईएम बेंगलुरू ने छात्रों से पूछा था कि आप अपना नाम हिन्दी में कैसे लिखते हैं बताइए, ताकि इसी हिसाब से डिग्री में नाम को दर्ज किया जाए. लेकिन संस्थान के इस फैसले के खिलाफ छात्रों ने नाराजगी जाहिर की है. छात्रों ने संस्थान के इस प्रस्ताव पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि संस्थान उनपर जबरदस्ती हिन्दी भाषा को उनपर थोपना चाहता है.

छात्रों से मेल करके पूछा गया था उनका हिंदी में नाम 

संस्थान के इस फैसले के खिलाफ छात्र का कहना है कि जब हम विदेश की किसी यूनिवर्सिटी में आवेदन करते हैं तो वहां कौन हिन्दी समझता है, आखिर क्यों हिन्दी थोपी जा रही है. पूरे संस्थान में इस फैसले के खिलाफ बहस छिड़ गई है. संस्थान की ओर से तमाम छात्रों को मेल भेजकर उनसे पूछा गया था कि वह अपना नाम हिन्दी में कैसे लिखते हैं. छात्रों से कहा गया था कि अपने नाम हिन्दी में कैसे लिखा जाता है बता दें, ताकि मार्कशीट की प्रिंटिंग की जा सके.

सत्र के कई छात्रों के मुताबिक उन्हें मेल करके कहा गया था कि इस मेल की महत्ता को समझिए और इसका जवाब दीजिए. इसके बाद छात्रों को फिर से रिमाइंडर मेल भेजा गया. कई छात्रों ने मेल का जवाब दिया है, जिसमे उन्होंने कहा है कि वह अपने नाम को हिन्दी लिख पढ़ नहीं सकते हैं. अगर सर्टिफिकेट दो भाषा में छपनी है तो इसे हमारी क्षेत्रीय भाषा में छापना चाहिए ताकि हम इसे समझ सके नाकि हिन्दी में.

हालांकि आईआईएम बेंगलुरू ने किसी भी प्रकार के विरोध से इंकार किया है. उनका कहना है कि इस मामले पर अभी हम लोग विचार कर रहे हैं लेकिन किसी भी छात्र को इसके लिए बाध्य नहीं किया गया है. आईआईएम का कहना है कि जिन लोगों को इस पहल से आपत्ति होगी, उनसे बात करके रास्ता निकालने की कोशिश की जाएगी.

आईआईएम बेंगलुरू करेगा विकल्प की तलाश 

देखा जाए तो विकल्पों पर भी मंथन किया जायेगा. आईआईएम बेंगलुरू ने डिग्री पर छपाई के लिए हिंदी भाषा को तरजीह दी है. मातृभाषा उपाधि पर हो तो बेहतर है लेकिन देश से बाहर नौकरी के लिए जाने वाले विद्यार्थियों के लिए थोड़ी मुश्किल भरी हो सकती है.

देखा जाये तो बड़े संस्थानों के विद्यार्थी देश से बाहर नौकरियों के लिए जाया करते है. अच्छे पैकेज और नौकरी की तलाश में विदेशों में भारत से जाने वाले विद्यार्थी बड़ी संख्या में होते हैं. उन्हें उनकी काबिलियत के दम पर नौकरी मिलती भी है. लेकिन अब इंटरनेशनल लैंग्वेज की जगह मातृभाषा में डिग्री छपी होने के कारण उन्हें थोड़ी समस्या हो सकती है. आईआईएम बेंगलुरू भी छात्रों के विरोध देखते हुए विकल्पों पर विचार करेगा. या तो दोनों भाषाओं में डिग्री छापी जायेगी या अन्य कोई विकल्प खोजा जायेगा.

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