जानिए आखिर क्यों कोणार्क के सूर्य मंदिर की वजह से पानी के जहाज हो जाते थे दर्घटना के शिकार

भारत कई शानदार मंदिरों का घर है, जिसने अनादिकाल से ही दुनिया भर में लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया है. ओडिशा के कोणार्क में स्थित सूर्य मंदिर एक ऐसी वास्तु कृति है जो भगवान सूर्य को समर्पित है. राजा लांगूल नृसिंहदेव के द्वारा निर्माण किया गया. इस मंदिर को यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में शामिल किया गया है. मंदिर की ऐसी कई खासियतें है जिस हर कोई नहीं जानता. आज हम आपको इस मंदिर की कुछ ख़ास बाते बताने जा रहे है.

पौराणिक महत्त्व 

पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को उनके श्राप से कोढ़ रोग हो गया था. साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में बारह वर्षों तक तपस्या की और सूर्य देव को प्रसन्न किया था. सूर्यदेव, जो सभी रोगों के नाशक थे. उन्होंने इसके रोग का भी निवारण कर दिया था. जिसके बाद साम्ब ने सूर्य भगवान का एक मन्दिर निर्माण का निश्चय किया. अपने रोग-नाश के बाद चंद्रभागा नदी में स्नान करते हुए उसे सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली. यह मूर्ति सूर्यदेव के शरीर के ही भाग से देवताओं के वास्तुकार विश्वकर्मा ने बनायी थी. साम्ब ने अपने बनवाये मित्रवन में एक मन्दिर में, इस मूर्ति को स्थापित किया, तब से यह स्थान पवित्र माना जाने लगा.

सूर्य को समर्पित है मंदिर

इस मंदिर का निर्माण काले पत्थर (granite) से किया गया है, जिसमे 1200 लोग लगे हुए थे. इस मंदिर को पूरा करने में 12 साल लग गए थे. कोणार्क मंदिर को एक रथ के आकार के हिसाब से बनाया गया गया है. इस रथ में चारो तरफ 24 पहिये बनाये गए हैं और रथ को खींचने के लिए इसके आगे 7 घोड़े को बनाया गया है.
इन पहियों के मंदिर के मुख्य आकर्षण के लिए बनाया गया है, और इसकी खासियत यह है कि इस समय बताता है. उस ज़माने में सूर्य की गतिविधियों को देखकर समय पता किया था. 24 पहिये यानि के आज के हिसाब से 24 घंटे.  इसी तरह उस वक़्त समय का निर्धारण किया जाता था.

जब इस मंदिर को बनाया गया था तो उस वक़्त यह समुद्र के बीच था. लेकिन आज समुद्र और मंदिर के बीच में काफी दूरी बढ़ गई है. उस ज़माने में जो लोगो समुद्र की यात्रा करते थे वो लोग इसको Navigational Point की तरह इस्तेमाल करते थे. इस मंदिर का गहरे काले रंग के वजह से इसको “Black Pagoda” के नाम से जाना जाता था.

झूलती हुई मूर्ति बन जाती दुर्घटना का कारण 

मंदिर के अन्दर सूर्य भगवन की मूर्ति को मंदिर के मध्य भाग में हवा में रखा गया था, मूर्ति मंदिर के अन्दर झूलती हुई रहती थी, क्यूँ की चारो तरफ चुम्बक का इस्तेमाल करके उसको इस तरह से रखा गया था की मूर्ति हवा में झूलती रहे .

इस चुम्बक के इस्तेमाल से एक मैग्नेटिक उर्जा उत्पन होती थी जिसकी वजह से समुद्र में आने जाने वाले जहाजो की दुर्घटना की कारण बनती थी. अपने पोतों को बचाने हेतु, मुस्लिम नाविक इस पत्थर को निकाल ले गये. यह पत्थर एक केन्द्रीय शिला का कार्य कर रहा था, जिससे मंदिर की दीवारों के सभी पत्थर संतुलन में थे. इसके हटने के कारण, मंदिर की दीवारों का संतुलन खो गया और परिणामतः वे गिर पड़ी. परन्तु इस घटना का कोई ऐतिहासिक विवरण नहीं मिलता, ना ही ऐसे किसी चुम्बकीय केन्द्रीय पत्थर के अस्तित्व का कोई ब्यौरा उपलब्ध है.

कोणार्क मंदिर के पास ही दो और मंदिर बनाये गए थे जो की आज बिल्कुल खंडर बन चूका है. उनमे से एक है मायादेवी की मंदिर. जो सूर्यदेव की पत्नी है. मंदिर के अन्दर सूर्य भगवान की मूर्ति को ऐसे रखा गया था की सुबह की पहली किरण उसपर गिरती है. कोणार्क मंदिर की एक और खासियत यह इसकी “Dancing Hall” नाटय मंडप. यहाँ पर कई सारे मूर्तियाँ देखने को मिलेगी जो की पूरी तरह से पत्थर से बनायीं गई है.

ध्वस्त हो गया मंदिर का कई भाग 

कई इतिहासकारों का मत है, कि कोणार्क मंदिर के निर्माणकर्ता, राजा लांगूल नृसिंहदेव की अकाल मृत्यु के कारण, मंदिर का निर्माण कार्य खटाई में पड़ गया. इसके परिणामस्वरूप, अधूरा ढांचा ध्वस्त हो गया. मन्दिर की ध्वस्तता के सम्पूर्ण कारणों का उल्लेख करना जटिल कार्य से कम नहीं है। परन्तु यह सर्वविदित है कि अब इसका काफी भाग ध्वस्त हो चुका है. जिसके मुख्य कारण वास्तु दोष भी कहा जाता है परन्तु मुस्लिम आक्रमणों की भूमिका अहम रही है.

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