किसी ने 60 से 70 दिनों तक तो किसी ने 16 साल तक किया अनशन और उपवास

आजकल एक से 10 दिनों के लिए भूख हड़ताल और उपवास भले ही चुनावी स्टंट बन गया हो। मगर भारत के इतिहास में भूख हड़ताल उपवास की कुछ ऐसी घटनाएं है जो स्टंट नहीं लोगों के हित के लिए उठी मांगों को पूरा करने के लिए रहा। ऐसे कई भूख हड़ताल भी हुए जिनके बारे में जानकार यक़ीन ही नहीं होगा। चलिए जानते है भारत के बहुचर्चित भूख हड़ताल और उपवास के बारे में….

पोट्टि श्रीरामुलु 58 दिनों का भूख हड़ताल और मौत-:

गुलाम भारत को आजाद करने के लिए कई वीरों ने अपनी जान गवाई तो कई हसते -हसते सूली चढ़े। मंगलपांडे, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव चंद्रशेखर आजाद को दुनिया जानती है। मगर भारत में कुछ ऐसे भी अहिंसक क्रांतिकारी भी हुए जिन्होंने अपनी मांगों को लेकर अपनी जान दे दी।

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एक ऐसे ही क्रांतिकारी थे पोट्टि श्रीरामुलु। जिनकी कुर्बानी के बाद गांधी जी ने कहां था अगर पोट्टी जैसे 11 लोग उनके साथ होते तो भारत को आजादी एक साल में मिल जाती।

40 से 50 के दशक में मद्रास विभाजन की मांग लंबे समय से चली आ रही थी। लेकिन भारत सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही थी। इस पर पोट्टी श्रीरामुलु ने घोषणा की कि “सत्ताधिकारियों को सक्रिय करके आंध्र प्रदेश की स्थापना के लिए मैं अपने प्राणों की बाजी लगा रहा हूँ।”

उन्होंने ऐसा ही किया। पोट्टि श्रीरामुलु ने अपने नगर नेल्लौर में हरिजनों के मंदिर प्रवेश के लिए 23 दिन अनशन करके उसमें सफलता पाने के बाद मद्रास से अलग राज्य की मांग करते हुए 19 अक्तूबर, 1952 से वे आमरण अनशन पर बैठे।

अनशन के 56वें दिन पोट्टी कोमा में चले गए, दो दिन वे कोमा में रहे। फिर सांस लेने में परेशानी होने लगी थी। चेन्नई में 58वें दिन 15 दिसंबर 1952 को उन्होंने दम तोड़ दिया था। पोट्टि श्रीरामुलु का 58 दिन तक यह अनशन चला और अपने उद्देश्य के लिए उन्होंने प्राणों की आहुति दे दी।

पोट्टि श्रीरामुलु के बलिदान के चार दिन बाद प्रधानमंत्री ने संसद में घोषणा की कि मद्रास प्रदेश को विभाजित करके पृथक् आंध्र प्रदेश की स्थापना की जाएगी । 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र प्रदेश का गठन हुआ। दूसरी बार 1 नवंबर 1956 को आंध्र प्रदेश का गठन फिर हुआ, जिसकी राजधानी हैदराबाद बनी। पोट्टि श्रीरामुलु का बलिदान व्यर्थ नहीं गया था।

ब्रिटिश जेल प्रशासन के खिलाफ जतिन दास का 63 दिनों का अनशन-:

साल 1929 में 13 जुलाई को लाहौर जेल के भीतर एक ऐसी भूख हड़ताल शुरू हुई जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है। जतिन दास ने भारत के राजनीतिक कैदियों के साथ भी यूरोपीय कैदियों की तरह व्यवहार करने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। दास की हड़ताल तोड़ने के लिए ब्रिटिश जेल प्रशासन ने काफ़ी कोशिशें कीं।

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मुंह और नाक के रास्ते ज़बरदस्ती खाना डालने की कोशिश भी की गई लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अंत में अंग्रेज़ सरकार को झुकना पड़ा। लेकिन 63 दिन भूखा रहने की वजह से जतिन दास की तबीयत काफ़ी बिगड़ गई और डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। 13 सितंबर को उनका निधन हो गया।

सुंदरलाल बहुगुणा, 74 दिनों का उपवास-:

कई दशकों से टिहरी बांध विरोधी प्रदर्शनों के लिए मशहूर रहे सुंदरलाल बहुगुणा अपने सत्याग्रह से कई बार सरकारों और संसद के लिए मुश्किल पैदा कर चुके हैं। उन्होंने कई बार विरोध जताने के लिए भागीरथी के किनारे भूख हड़ताल की हैं।

साल 1995 में बांध के असर पर समीक्षा समिति बनाने से जुड़े तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने 45 दिन चला अनशन समाप्त किया था। इसके बाद उन्होंने राजघाट पर 74 दिन लंबा उपवास भी रखा।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में एक दशक से भी ज़्यादा लंबा केस चला और साल 2001 में टिहरी बांध पर निर्माण फिर शुरू हुआ। इसके बाद 20 अप्रैल 2001 को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। सन 1971 में शराब की दुकानों को खोलने से रोकने के लिए सुन्दरलाल बहुगुणा ने सोलह दिन तक अनशन किया।

चिपको आन्दोलन के कारण वे विश्वभर में वृक्षमित्र के नाम से प्रसिद्ध है। इनकी इन प्रसिद्धियों के आलावा चिपको आंदोलन एक बड़ी उपलब्धि थी।

क़ुरान-गीता सुनते हुए गांधी जी रखते थे उपवास-:

मोहनदास करमचंद गांधी अहिंसा और सत्याग्रह के तहत कई बार उपवास किया करते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में क़रीब 15 उपवास किए, जिनमें से तीन बार इनकी मियाद 21 दिन रही।

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पहली बार 21 दिन का उपवास उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए किया था जो दिल्ली में साल 1924 में 18 सितंबर से 8 अक्टूबर तक चला। उन्होंने क़ुरान-गीता सुनते हुए ये उपवास समाप्त हुआ था।

21 दिन का दूसरा उपवास साल 1933 में 8 मई से 29 मई के बीच हुआ जो छुआछूत के विरोध में किया गया था। 21 दिन का तीसरा उपवास उन्होंने साल 1943 में 12 फ़रवरी से 4 मार्च के बीच किया जिसका मक़सद साम्प्रदायिक दंगे रोकना था।

इरोम चानू शर्मिला का 16 साल का भूख हड़ताल-:

इन्हें आयरन लेडी या मेंगुओबी भी कहा जाता है. मणिपुर की नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इरोम ने सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम, 1958 को हटाने की मांग को लेकर साल 2000 में 5 नवंबर को भूख हड़ताल शुरू की थी और 16 साल बाद साल 2016 में 9 अगस्त को ख़त्म हुई।

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500 से ज़्यादा हफ़्ते तक बिना खाने और पानी की रहने वाली इरोम को दुनिया की सबसे लंबी भूख हड़ताल के लिए जाना जाता है। हालांकि इस दौरान अदालत के आदेश पर इरोम को पाइप के ज़रिए नाक से आवश्यक तत्व दिए जा रहे थे।

स्रोत- bharatdiscovery.org, बीबीसी

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