जब नागों को खत्म करने वाला यज्ञ रह गया अधूरा !

फिल्मों और टीवी धारवाहिकों में नाग लोक की कहानियों को तो आपने देखा ही होगा. मगर क्या वाकही में धरती पर नागों का कोई अस्तित्व रहा है. इस पर आज भी कई बहस और खोज जरी है. मगर कई धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं में सर्प देव अथवा नाग देवता का जिक्र मिलता है. तो चलिए जानते है आखिर कहा किस रूप में नाग देवता जिक्र है.

नागों की उत्पत्ति 

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कालिया नाग के सर पर नृत्य करते भगवान कृष्ण

कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं. एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान माँगने को कहा. कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की माँ बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों. कद्रू ने 1000 अंडे दिए और विनता ने दो. समय आने पर कद्रू के अंडों से 1000 सर्पों का जन्म हुआ.

वासुकि नाग (Vasuki Nag) 

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धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है. ये भी महर्षि कश्यप व कद्रू की संतान थे. इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है. इनकी बुद्धि भी भगवान भक्ति में लगी रहती है. जब माता कद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि बहुत चिंतित हुए. तब एलापत्र नामक नाग ने इन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु से उत्पन्न पुत्र ही सर्प यज्ञ रोक पाएगा.

तब नागराज वासुकि ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया. समय आने पर जरत्कारु ने आस्तीक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया. आस्तीक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था. धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकी की नेती बनाई गई थी. त्रिपुरदाह के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे.

सर्प देव

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सांपों के देवता माने जाने वाले शेषनाग को सदियों से पूजनीय माना जाता है. वैदिक लोगों से लेकर चीनी और सुमेरियन तक इन नाग देवताओं की पूजा करते थे. हां, पूजा करने का तरीका और इनका स्वरूप हर दौर और धर्म में थोड़ा अलग रहा है. हर सभ्यता के अपने अलग-अलग सर्प देवता रहे हैं. भारतीय लोग विष्णु के सावरी के रूप मानते है, जोकि एक सर्प है, जिस पर लोग आस्था रखते हैं, चीनी लोग ड्रैगन पर विश्वास करते हैं.

बाइबल में नागों का रहस्य

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यहां तक कि ईसाई धर्म के पवित्र ग्रंथ माने जाने वाले बाइबल में भी लुसिफायर नाम के सांप का जिक्र हैं, जिसने आदम और हौवा को स्वर्ग के उस सेब को खाने के लिए मजबूर किया था, जिसको खाने की मनाही थी.

वेदों में भी मौजूद हैं सर्प देव

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वेदों में भी सर्प देवताओं से जुड़ी कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है. हमारे धर्म ग्रंथो में शेषनाग, वासुकि नाग, तक्षक नाग, कर्कोटक नाग, धृतराष्ट्र नाग, कालिया नाग आदि नागो का वर्णन मिलता है.

तक्षक नाग (Takshak Nag)

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धर्म ग्रंथों के अनुसार तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है. तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है. उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी. तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था. इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे. यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया.

जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा. तभी आस्तीक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया. उसी समय आस्तीक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए. ग्रंथों के अनुसार तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता है.

कर्कोटक नाग (Karkotaka Naga)

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कर्कोटक शिव के एक गण हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए.

ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की. शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा. इसके उपरांत कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रविष्ट हो गया. तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं. मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती.

धृतराष्ट्र नाग (Dhritarashtra Naga)

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धर्म ग्रंथों के अनुसार धृतराष्ट्र नाग को वासुकि का पुत्र बताया गया है. महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया तब अर्जुन व उसके पुत्र ब्रभुवाहन (चित्रांगदा नामक पत्नी से उत्पन्न) के बीच भयंकर युद्ध हुआ. इस युद्ध में ब्रभुवाहन ने अर्जुन का वध कर दिया. ब्रभुवाहन को जब पता चला कि संजीवन मणि से उसके पिता पुन: जीवित हो जाएंगे तो वह उस मणि के खोज में निकला.

वह मणि शेषनाग के पास थी. उसकी रक्षा का भार उन्होंने धृतराष्ट्र नाग को सौंप था. ब्रभुवाहन ने जब धृतराष्ट्र से वह मणि मागी तो उसने देने से इंकार कर दिया. तब धृतराष्ट्र एवं ब्रभुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ और ब्रभुवाहन ने धृतराष्ट्र से वह मणि छीन ली. इस मणि के उपयोग से अर्जुन पुनर्जीवित हो गए.

कालिया नाग (Kaliya Naag)


श्रीमद्भागवत के अनुसार कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था. उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था. श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए. यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ. अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया. तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की. तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं ओर निवास करो. श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं ओर चला गया.

दूसरी दुनिया

जब दूसरे लोक से जुड़े देवताओं की बात उठती है तब अलग-अलग संस्कृति और सभ्यताओं में इन्हें अलग-अलग तरीके से पहचान दी जाती है. विभिन्न सभ्यताओं के लोग अपने सर्प देवताओं को अलग-अलग नाम और स्वरूप से पहचानते हैं.

कई सिरों वाला सांप

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विष्णु का सात सिरों वाला सर्प वाहन और शिव के गले में बंधा नाग, अलौकिक माने जाते हैं और लोग इनके प्रति श्रद्धा रखते हैं. इसके अलावा चीन के लोग भी ड्रैगन देवता पर आस्था रखते हैं, जिन्होंने उन्हें विज्ञान और अन्य कलाओं की शिक्षा दी.

कंबोडिया की मान्यता

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कंबोडिया की परंपराओं में सर्पों की सात प्रजातियों का जिक्र मिलता है. जिनमें से एक प्रशांत महासागर के भीतर रहती है. ऐसा माना जाता है कि नागाओं के राजा की बेटी का विवाह भारतीय साधु कौंडिन्य के साथ हुई, कंबोडिया के लोग इन्हीं के वंशज हैं.

प्राचीन सिद्धांत

यह सभी प्राचीन सिद्धांत हैं किंतु आधुनिक युग के ब्रह्मवादी या आधुनिकवादी लोगों का मानना है कि पूर्व प्रचलित सभी बातें मात्र परिकल्पना हैं. असल में स्वर्ग के देवता एलियंस के उन्नत रूप हैं, जब ये देवता धरती पर उतरे तब उनमें से कुछ बेहतरीन वैज्ञानिक भी थे.

ईश्वर के समान रूप

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यह भी माना जाता है कि मानव के शरीर में कुंडलिनी के रूप में एक सोया हुआ सर्प है, जिस पर निर्भर रहकर मनुष्य जीवन जीता है. जब कोई व्यक्ति कुंडलिनी को जागृत कर लेता है तो वह ईश्वर के समान स्थापित हो जाता है.

लेकिन फिर भी यह सत्य हैं कि संसार नागों से जुड़े सवालों को प्राचीन काल से सुलझाने की कोशिश में लगा है. लेकिन इस सवाल का जवाब आज भी मिल नहीं पाया है कि वास्तव में ये सर्प देवता या नाग धरती पर आए कहां से थे.

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