चाणक्य के मृत्यु की दिलचस्प कहानी

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भारतवर्ष में चाणक्य को कौन नहीं जानता? प्राचीन ‘मौर्य’ साम्राज्य की स्थापना जिस कुशाग्र बुद्धिजीवी के मार्गदर्शन से हुई, जिन्होंने कौटिल्य अर्थशास्त्र  नामक ग्रन्थ की रचना कर राजव्यवस्था, कृषी, न्याय, और राजनीति जैसे कई मुल्य को स्थापित किया, मौर्य साम्राज्य के सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु यानी चन्द्रगुप्त मौर्य..

उन्होंने न केवल राजा नन्द जैसे क्रूर शासक से अपने अपमान का बदला लिया अपितु चन्द्रगुप्त जैसे महान राजा का चरित्र निर्माण कर एक कुशल शासक मौर्य साम्राज्य को दिया. और आज के भारत की नीव रखी.

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आज तक हमने आचार्य चाणक्य की बुद्धिमत्ता या राजनितिक ज्ञान के बारे में बहूत सुना है पर क्या आपको उनके मृत्यु के बारे में पता है? चलिए आज हम इस बारे में कुछ जानने की कोशिश करते है.

चाणक्य के मृत्यु के प्रति कई शोधकर्ताओ में मतभेद हें. लेकिन कई जैन धर्म ग्रन्थ में एक कहानी पाई गयी हें.

बता दे कि, चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने जीवन के आखिरी समय जैन धर्म का स्वीकार किया और राज्य त्यागकर संन्यास धारण किया था.

उन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांस कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में ली. जहां भगवान बाहुबली की भव्य मूर्ति है. यह स्थान जैन धर्म के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो की एक तीर्थ क्षेत्र भी है.

हमें पता है कि, अपने प्रिय शिष्य चन्द्रगुप्त के प्रति चाणक्य का केवल विश्वास ही नहीं बल्कि स्नेह भी था.

पर विचलित करने वाली बात ये है की, इसी स्नेह के खातिर चाणक्य चन्द्रगुप्त के अन्न में विष प्रयोग करते थे!

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अर्थात चाणक्य का हेतु शूद्ध और सरल था. मौर्य साम्राज्य का विस्तार और प्रसार क्षेत्रीय सीमाओं के बाहर हो रहा था. लेकिन इसी वजह से चन्द्रगुप्त के कई शत्रु भी पैदा हुए थे. अपने राजा पर कभी-भी विष प्रयोग हो सकता है, ये खतरे की बात चाणक्य जानते थे.

तो ऐसा कभी भविष्य में हुआ तो जहर को प्रतिरोध करने की शक्ति बनाये रखने क लिए चन्द्रगुप्त के अन्न में हर दिन थोड़ा-थोड़ा जहर मिलाया जाता था.

पर दुर्भाग्यवश एक दिन रानी दुर्धर ने राजा के लिए बनाये गए भोजन का आस्वाद लिया. उस समय वो गर्भवती थी और जल्द ही एक सप्ताह में प्रसूति होने वाली थी.

अचानक ग्रहण किया गया भोजन जिसमे विष था, उस वजह से रानी को वेदनाए होने लगी और वो चिल्लाने लगी. चाणक्य दुसरे कक्ष में थे. वह भागते हुए आए और परिस्तिथि को जाना .

कुछ भी हो जाय बस राजा का वंश रहना चाहिए और उसे विषबाधा नहीं होनी चाहिए. इस उद्देश्य से चाणक्य ने जल्द ही शिशु को उसके माता के पेट से बाहर निकाला. शिशु बच गया पर रानी की मृत्यु हो गयी.

कहा जाता हैं की, उस जहर की एक बूंद बच्चे के माथे को छु चुकी थी और इस वजह से बच्चे के माथे पर ब्लू स्पॉट पड़ा…. यही दूसरा मौर्य सम्राट … राजा बिन्दुसार … सम्राट अशोक के पिता..

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बिन्दुसार बड़ा हुआ और राजा बना. चन्द्रगुप्त ने सन्यास लिया पर चाणक्य तभ भी बिच-बिच में बिन्दुसार का मार्गदर्शन करते थे.

बिन्दुसार का प्रधान – सुबंधु- चाणक्य का द्वेष करता था. उसने राजा को उनके जन्म और उनकी मां के मृत्यु की कथा सुनाई. यह सुनकर राजा बिन्दुसार अपना आपा खो बैठे और अपनी मां पर चाणक्य ने विषप्रयोग किया, ऐसा समझकर आचार्य चाणक्य पर बहुत गुस्सा हुए.

व्यथित चाणक्य ने सब कुछ त्याग कर मृत्यु के लिए अन्न पानी को भी त्याग दिया. आगे जाकर जब बिन्दुसार को सत्य का पता चला, तब उन्होंने चाणक्य से क्षमा मांगी. पर एक बार जो थाना वो करने वाले चाणक्य ने राजा की बात नहीं मानी और उनका स्वर्गवास हो गया.

अन्न पानी त्याग कर देह रखने की ये प्रथा आज भी जैन संप्रदाय में होती हें जिसे ‘सल्लेखना’ कहा जाता है.

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