पुलवामा आतंकवादी हमले का करारा जवाब देने की क्षमता रखने वाला भारत का सपूत

कल दुपहर जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में कायराना आतंकी हमले में सीआरपीएफ के ४० जवान शहीद हो गए हैं। इस हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद नाम के आतंकी संगठन ने ली है। पाकिस्तान सरकार भलेही इसकी जिम्मेदारी ना ले, पर पूरा विश्व ये भली भाँति जानता है कि जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संघटनो को परदे के पीछे कौन चला रहा है |

ऐसे समय पर उन्हें करारा जवाब देने की इच्छा हर भारतीय में होती है, और उस सपने को पूरा करने की क्षमता रखने वाले एक ऐसे ही सपूत के बारे में जानते है|

आजतक आपने जासूसी के किस्से कारनामे फिल्म, धारावाहिक और कहानियों में देखा या सूना होगा। लेकिन सुरक्षा कारणों से वास्तविकता में जासूसी के किस्से कम ही देखने सुनने को मिलता है। मगर एक भारतीय ऐसा भी है जिसके कंधे पर है पुरे देश की राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय सुरक्षा का जिम्मा। जिसके नाम से डरता है पाकिस्तान। जिसने कश्मीर में आतंकियों को उन्ही के खिलाफ कर दिया।

अपने तेज तर्रार दिमाग की बदौलत म्यांमार, पंजाब और मिजोरम में देश विरोधी मुद्दों समेत आतंकी हमलों को साहसिक तरीके से सामना करने वाले देश के महान जासूस अजीत डोभाल . जिनके कारनामे ऐसे है जिसके आगे जेम्सबॉन्ड के किस्से भी फीके पड़ जाय। यही नहीं 1999 में कंधार विमान अपहरण मामला और वर्ष 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक करके भाजपेयी और मोदी सरकार के संकटमोचक भी कहलाये। डोभाल भारत के ऐसे एकमात्र नागरिक हैं जिन्हें शांतिकाल में दिये जाने वाले दूसरे सबसे बड़े पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया है। आइए जानते हैं अजीत डोभाल के कुछ रोमांचक किस्सों के बारे में…!

सात सालों तक एक मुस्लिम बनकर पाकिस्तान में करते रहे जासूसी-:

वर्त्तमान में भारत सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) और केरल कैडर के 1968 बैच के आईपीएस अजीत डाभोल का जन्म 20 जनवरी 1945 में उत्तराखण्ड राज्य के पौड़ी गढ़वाल में हुआ। डोभाल ने अजमेर मिलिट्री स्‍कूल से पढ़ाई की है और आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्‍त्र में एमएम किया।1972 में भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी से जुड़े।

डोभाल ने अपना ज्यादातर समय खुफिया विभाग में जासूसी करके गुजारा है। वह 2005 में आईबी की डायरेक्टर पोस्ट से रिटायर हुए हैं। उन्होंने अपने पूरे करियर में सिर्फ सात साल ही पुलिस की वर्दी पहनी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि खुफिया एजेंसी रॉ के अंडर कवर एजेंट के तौर पर डोभाल 7 साल पाकिस्तान के लाहौर में एक पाकिस्तानी मुस्लिम बन कर रहे।

पंजाब को नहीं बनने दिया एक अलग देश-:

पंजाब को एक अलग देश घोषित करने की मांग को लेकर जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर अलगाववादियों ने कब्ज़ा कर लिया जिसे भारतीय सेना के जवानों ने काउंटर ऑपरेशन ब्लू स्टार अभियान चलाकर मुक्त कराया। इस घटना के बाद दोबारा 1988 में पाकिस्तान समर्थन से ख़ालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके हथियारबंद समर्थकों ने स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया।

इस बार इस मसाले को सुलझाने के लिए इसकी जिम्मेदारी इनको सौपी गयी। डोभाल ऑपरेशन ब्लैक थंडर के तहत रिक्शावाला बनकर मंदिर के अंदर गए और अलगाववादियों की संख्या, उनके पोजीशन समेत कई अहम् जानकारी सेना को दी, जिसके आधार पर ऑपरेशन में भारतीय सेना को सफलता मिली।

कश्मीर में आतंकवादियों को किया उन्ही के खिलाफ

डोभाल के बारे में ये भी कहा जाता है कि 90 के दशक में उन्होंने कश्मीर के ख़तरनाक अलगाववादी कूका पारे का ब्रेनवाश कर उसे काउंटर इंसर्जेंट बनने के लिए मनाया था. जिसके बाद कूका चुनाव जीते और विधायक भी बने हालांकि बाद में उन्हें आतंकियों ने मार दिया। 1999 के कंधार विमान अपहरण के दौरान तालिबान से बातचीत करने वाले भारतीय दल में अजीत डोभाल भी शामिल थे.

घटना में आतंकियों ने एयर इंडिया के विमान का अपहरण कर अफगानिस्तान ले गए। जिसमे कुल 180 यात्री थे। इस घटना में डोभाल ने अहम् भूमिका निभाते हुए भारतीय जेलों में बंद तीन आतंकियों के बदले हवाई जहाज को रिहा करवाया।

अजीत डोभाल 33 साल तक नॉर्थ-ईस्ट, जम्मू-कश्मीर और पंजाब में खुफिया जासूस भी रहे। वह 2015 में मणिपुर में आर्मी के काफिले पर हमले के बाद म्यांमार की सीमा में घुसकर उग्रवादियों के खात्मे के लिए सर्जिकल स्ट्राइक ऑपरेशन के मास्टमाइंड भी रहे। इस घटना पर आधारित 11 जनवरी 2019 को उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक फिल्म भी रिलीज हुई है।

डोभाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दाये हाथ है

जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और अजीत डोभाल को NSA बनाया तो लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ. उसके बाद से मोदी सरकार में उनकी पैठ इस हद तक बढ़ गई कि कहा जाने लगा कि उन्होंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के असर को कम कर दिया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी निगरानी में भारत को कुछ बड़ी सफलताएं मिलीं हैं, चाहे वो फ़ादर प्रेम कुमार को आईएस के चंगुल से छुड़वाना हो या श्रीलंका में छह भारतीय मछुआरों को फाँसी दिए जाने से एक दिन पहले माफ़ी दिलवाना हो या देपसाँग और देमचोक इलाक़े में स्थायी चीनी सैन्य कैपों को हटाना हो डोभाल को वाहवाही मिली है लेकिन कई मामलों में उन्हें नाकामयाबी का मुंह भी देखना पड़ा है.

नेपाल के साथ जारी गतिरोध, नगालैंड के अलगाववादियों से बातचीत पर उठे सवाल, पाकिस्तान के साथ असफल बातचीत और पठानकोट हमलों ने अजीत डोभाल को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है.

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