जाने कैसे नागाओं ने एक महिला नेता को देवी चेराचमदीनलू का अवतार माना !

भारतीय विद्यालयों में छात्रों को स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी और कई अन्य राजनीतिक नेताओं की भूमिका के बारे में पढ़ाया जाता है. लेकिन उत्तर पूर्व से कई उल्लेखनीय राजनीतिक और आध्यात्मिक नेताओं ने भारत को स्वतंत्रता प्राप्त करने में मदद की थी. हालांकि उत्तर पूर्व के नेताओं की भूमिका हमेशा पाठ्यक्रम से गायब रही है. ऐसी ही एक नागा राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता रानी गैदिनलू की जांबाजी इतिहास के पन्नों से कहीं खो गई है. इसलिए, हमे उनके जीवन के बारे में जानना चाहिए.

 

Rani Gaidinlui-kuchnaya.com
nelive.com

रानी गैदिनलू (२६ जनवरी १९१५ – १७ फरवरी १९९३) – मणिपुर भारत से पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं. ‘स्वतंत्र भारत’ उनका सपना था. रानी गैदिनलू का जन्म मणिपुर के लोंगकाओ गांव में हुआ था. वह अपनी छः बहनों और एक भाई के बीच पांचवी संतान थी. अपने बचपन के दिनों से वह अपने गतिशील, बहुमुखी और सच्चे व्यक्तित्वों के लिए जानी जाती थी.

उनके जन्म के वक्त मणिपुर बाकी देश के साथ ब्रिटिश शासन का शिकार था. १९२७ में जब वह सिर्फ १३ वर्ष की थी तो वह पुइलन गांव में प्रमुख स्थानीय नेता हैपो जुडानांग से मुलाकात की और उनकी विचारधाराओं और सिद्धांतों से प्रेरित होकर उन्होंने उसी वर्ष में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी हेराका आंदोलन में शामिल हुई. जो जल्द ही मणिपुर और आसपास के नागा क्षेत्रों में आंदोलन बड़ा हो गया. नागा जनजातियों में उन्हें देवी चेराचमदीनलू का अवतार मानने लगे.

हेराका आंदोलन आदिवासी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का एक अवसर बन गया. इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करना और नागाओं के शासन की स्थापना करना था. कछार में हथियार इस्तेमाल करने से यह आंदोलन क्रूर ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ एक सशस्त्र विद्रोह में बदल गया.

जदोनांग दार्शनिकों से प्रभावित १६ साल की उम्र से वह एक गुरिल्ला योद्धा बन गई और ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. १९३१ में जदोनांग की गिरफ्तारी और फांसी के बाद वह उनकी वारिस और नेता बन गई. उसने खुलेआम ब्रिटिशों के खिलाफ विद्रोह किया. उन्होंने जेलियनग्रोंग लोगों को करों का भुगतान न करने का आग्रह किया. उन्हें जल्द ही स्थानीय नागा लोगों से दान प्राप्त होना शुरू हो गया.

अंग्रेजों ने उनकी चारों ओर खोज शुरू कर दी और उसे पकड़ने के लिए एक विशाल इनाम की घोषणा की. अंग्रेजों से बचने के लिए वह और उनकी सेना असम से मणिपुर और आगे नागालैंड तक चली गई. अंत में एक महीने बाद १९३२ में वह उत्तरी कछार पहाड़ियों में पूर्व असम राइफलों के साथ  हूँग्रुम गांव में कार्य में जुट गई.

अंग्रजों ने उसे पुलोमी गांव में एक आश्चर्यजनक हमले में गिरफ्तार किया. उसको इम्फाल ले जाया गया जहां उसे १० महीने तक अदालत में पेश किया गया था. इसके बाद उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उसके आंदोलन के अधिकांश सदस्यों को या तो फांसी हुई या जेल भेज दिया गया.

१९३३ से १९४७ तक उन्होंने गुवाहाटी, शिलांग, ऐजवाल और तुरा जेलों में सजा काटी. अंतरिम भारत सरकार की स्थापना के बाद १४ साल की कारावास के बाद उसे तुरा जेल से रिहा किया गया था. स्वतंत्रता के बाद वह भारत के भीतर एक स्वतंत्र ज़ेलियनग्राग क्षेत्र की संभावना पर चर्चा करने के लिए कई बार नेहरू से मिलीं. उनके उद्देश्य को नागा नेशनल काउंसिल से कठोर विरोध का सामना करना पड़ा जो भारत संघ के साथ विलय करना चाहते थे.  हालांकि जल्द ही उनके स्वयंसेवकों ने आत्मसमर्पण किया और उनमें से कुछ नागालैंड पुलिस में शामिल हो गए.

१९९३ में  उनके  जन्मस्थान लांगकाओ में उनकी मृत्यु हो गई. 1 9 72 में उन्हें ताम्रपत्र  फ्रीडम फाइटर अवार्ड, १९८२ में पद्म भूषण और १९८३ में विवेकानंद सेवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया. सरकार ने १९९६ में डाक टिकट जारी किया और 2015 में उनके स्मरणार्थ सिक्का जारी कर उनका उचित सम्मान किया. भारत के स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाला नेहरू ने उन्हें ‘पहाड़ियों की बेटी’ से वर्णित किया.

इस स्वतंत्रता सेनानी को हमारा नमन !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *