भारत के रहस्यमयी किले, कही गायब हो जाती है पूरी बारात तो कही पड़ा है अकूत दौलत

दुनिया भर में ऐसे कई इमारत, दुर्ग, किले, मीनार है जो अपने आप में रहस्यमय है। आज हम कुछ ऐसे ही किलों की बात करेंगे जिनके निर्माण से लेकर उनसे जुड़े कई रहस्य है जिसे आजतक कोई समझ नहीं पाया।

रायसेन किला-:

इतिहासकारों के अनुसार रायसेन किले का निर्माण एक हजार ईसा पूर्व किया गया है। जिसका निर्माण राजा रायसेन ने 11 वीं शताब्दी के आस-पास करवाया था। कहा जाता इस किले में कही पारस पत्थर है। जो लोहे को सोना बना देता था। जिसे हासिल करने के लिए कई राजाओं ने इस किले पर हमले किये। मगर सफल नहीं हो पाए।

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अंततः राजा ने इस पत्थर को यही कही किले में छिपा दिया। अब इसकी रखवाली एक जिन्न करता है। ये किला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 45 किलोमीटर दूर 500 से अधिक ऊंची पहाड़ी पर बलुवा पत्थर का बना है जो लगभग दस वर्ग किमी में फैला है। ये आज भी बड़े शान से ऊंची छोटी पर खड़ा है।

रायसेन के किला की चाहर दीवारी में वो हर साधन और भवन हैं, जो अमूमन भारत के अन्य किलों में भी हैं। लेकिन यहां कुछ खास भी है, जो अन्य किलों पर नजर नहीं आता। किला पहाड़ी पर तत्कालीन समय का वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और इत्र दान महल का ईको साउंड सिस्टम इसे अन्य किलों से तकनीकी मामलों में अलग करता है।

गजब का है ईको साउंड सिस्टम-:

इत्रदान महल के भीतर दीवारों पर बने ईको साउंड सिस्टम की मिशाल हैं। एक दीवार के आले में मुंह डालकर फुसफुसाने से विपरीत दिशा की दीवार में साफ आवाज सुनाई देती है। दोनो दीवारों के बीच लगभग बीस फीट की दूरी है। यह सिस्टम आज भी समझ से परे है।

एक जगह एकत्र होता है पानी-:

लगभग दस वर्ग किमी में फैले किला पहाड़ी पर गिरने वाला बारिश का पानी भूमिगत नालियों के जरिए किला परिसर में बने एक कुंड में एकत्र होता है। नालियां कहां से बनी हैं, उनमें पानी कहां से समा रहा है, कितनी नालियां हैं। ये सब आज तक कोई नहीं जान पाया।

साल में एक बार खुलता है मंदिर-:

दुर्ग पर स्थित सोमेश्वर महादेव का मंदिर साल में एक बार ही महाशिवरात्रि पर खुलता है। पुरातत्व विभाग के अधीन आने पर विभाग ने मंदिर को बंद कर दिया था। 1974 में नगर के लोगों ने एकजुट होकर मंदिर खोलने और यहां स्थित शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा के लिए आंदोलन किया। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी ने महाशिवरात्रि पर खुद आकर शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कराई। तब से हर महाशिवरात्रि पर मंदिर के ताले श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं और यहां विशाल मेला लगता है।

बांधवगढ का किला-:

बांधवगढ का किला भी मध्यप्रदेश राज्य में हैं। जो उमरिया जिला और शहडोल संभाग में आता हैं। यह किला 2000 वर्ष पहले बनाया गया था और इस किले का नाम शिवपुराण में मिलता है। इस किले को रीवा के राजा विक्रमादित्य सिंह ने बनवाया था। किले में 10 वीं शताब्दी की बनी भगवान विष्णु की शयन मुद्रा में एक बड़ी प्रतिमा है जो कई रहस्य समेटे हुए है।

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किले में जाने के लिए मात्र एक ही रास्ता है। जो घने जंगलों से हो कर गुजरता है। किले से एक गुप्त रास्ता रीवा के किले को भी जाता है। जिसमे राजा गुप्त सभा ,गुप्त बाते और किलो की गुप्त जानकारी रखते थे।

कलावंती दुर्ग यानी प्रभलगढ़ किला-:

महाराष्ट्र के माथेरान और पनवेल के बीच स्थित प्रभलगढ़ किले के बारे में बता रहे हैं, जो कलावंती किले के नाम से मशहूर है। 2300 फीट ऊंची खड़ी पहाड़ी पर बने इस किले को भारत के खतरनाक किलों में गिना जाता है। इस किले के बारे में बताया जाता है कि कठिन रास्ता होने के कारण यहां बेहद कम लोग आते हैं और जो आता है वह सूरज डूबने से पहले लौट जाता है।

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दरअसल, खड़ी चढ़ाई होने के कारण आदमी यहां लंबे समय तक नहीं टिक पाता है। साथ ही बिजली, पानी से लेकर यहां कोई भी व्यवस्था नहीं रहती। शाम होते ही मीलों दूर तक सन्नाटा फ़ैल जाता है। कलावंती दुर्ग के किले से चंदेरी, माथेरान, करनाल, इर्शल किले भी नज़र आते हैं। वहीं मुंबई शहर का कुछ इलाका भी इस किले से देखा जा सकता है।

अक्टूबर से मई तक इस किले पर चढ़ाई की जा सकती है। बारिश के दिनों यहां चढ़ाई बेहद खतरनाक हो जाती है। इस किले का नाम छत्रपति शिवाजी महाराज के राज में बदला गया। पहले इस किले को मुरंजन किला कहा जाता था। बताया जाता है कि शिवाजी ने रानी कलावंती के नाम पर इस किले को नाम दिया।

गढ़कुंडार किला-:

यूपी के झांसी से करीब 70 किलोमीटर दूर गढ़कुंडार में भी एक ऐसा ही किला है, जो बेहद रहस्मयी है। 11वीं सदी में बना ये किला 5 मंजिल का है। 3 मंजिल तो ऊपर हैं, जबकि 2 मंजिल जमीन के नीचे है।

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इस किले में दो फ्लोर का बेसमेंट है। जिसके बारे में कहा जाता है इसमें इतना खजाना है कि भारत अमीर हो जाए।
इसके निर्माण के बारे में अब तक कोई सही तारीख का प्रमाण कही नहीं मिलता। मगर कहा जाता है ये किला 1500 से 2000 साल पुराना है। यहां चंदेलों, बुंदेलों, खंगार कई शासकों का शासन रहा।

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एक बार यहां घूमने आई एक पूरी की पूरी बरात गायब हो गई थी। गायब हुए लोगों का आज तक पता नहीं चल सका। इसके बाद नीचे जाने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया गया। 2000 साल पुराना है किला। ये किला भूल-भुलैय्या की तरह है। अगर जानकारी न हो तो इसमें अधिक अंदर जाने पर कोई भी दिशा भूल हो सकता है। दिन में भी अंधेरा रहने के कारण दिन में भी ये किला डरावना लगता है।

खजाने की तलाश में गुम हो गए कई लोग-:

खजाने को तलाशने के चक्कर में कईयों की जानें भी गई हैं। गढ़कुंडार का किला बेहद रहस्मयी है। कहा जाता है कि इसके बेसमेंट में कई रहस्य अभी भी मौजूद हैं। दो फ्लोर बेसमेंट को बंद कर दिया गया है। खजाने का रहस्य इसी में छिपा हुआ है।

सुरक्षा की दृष्टि से बेजोड़ नमूना-:

ये किला सुरक्षा की दृष्टि से बनवाया गया एक ऐसा बेजोड़ नमूना है, जो अब तक लोगों को भ्रमित कर देता है। किला एक ऊंची पहाड़ी पर एक हेक्टेयर से अधिक वर्गाकार जमीन पर बना हुआ है।

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