माता का मंदिर ऐसा जिनके दर्शन के लिए सिलाई किये कपड़े पहनकर जाना है मना !

शास्त्रों में देवी के अनेक रूपों का वर्णन किया गया है और पृथ्वीलोक में कई जगहों पर उनकी स्थापना का उल्लेख मिलता है. नगर के संभ्रांतजनों से लेकर वनवासियों तक में देवीपूजन का वर्णन धर्मग्रंथों में मिलता है. देवी ने धरती पर अवतरण अपने भक्तों के उद्धार और उनके कष्टों का हरण करने के लिए लिया है.

साधना और तपस्या के रास्ते मां से एकाकार किया जा सकता है. पृथ्वीलोक पर वैसे तो मां के शक्तिपीठों की महिमा अपरंपार है और शक्तिपीठों के चमत्कार की वजह से इन मंदिरों में बारहोमास भक्तों का हुजूम लगा रहता है. शास्त्रों में कहीं 51 तो कहीं पर 52 शक्तिपीठों का उल्लेख मिलता है.

कई धर्मग्रंथों में शक्तिपीठों की संख्या है अलग-अलग 

 

‘देवी पुराण’ में शक्तिपीठों की संख्या 51 बताई गई है, जबकि’ तन्त्रचूडामणि’ में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं. कुछ धर्मग्रंथों में इनकी संख्या 108 तक बताई गई है. इन्ही में से एक ऐसा ही प्राचीन और पौराणिक देवी का मंदिर छत्तीसगढ़ के बस्तर में है .जो भव्य और चमत्कारिक स्वरूप में स्थित है. जिसमे माता को दंतेश्वरी देवी विराजती है.

दन्तेवाड़ा को हालांकि देवी पुराण के 51 शक्ति पीठों में शामिल नहीं किया गया है लेकिन इसे देवी का 52 वा शक्ति पीठ माना जाता है. मान्यता है कि यहाँ पर सती का माता का दांत गिरा था इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा और माता क़ा नाम दंतेश्वरी देवी पड़ा.

मंदिर में सिलाई किया हुआ कपड़ा पहनकर जाना वर्जित है

दंतेश्वरी देवी का मंदिर शंखिनी और डंकिनी नाम की दो नदियों के संगम पर स्थित हैं. देवी को बस्तर जिले की कुलदेवी माना जाता है. इस मंदिर की एक खासियत यह है की माता के दर्शन करने के लिए आपको लुंगी या धोति पहनकर ही मंदीर में जाना होगा. मंदिर में सिले हुए वस्त्र पहन कर जानें की मनाही है.

मंदिर के निर्माण के पीछे की कहानी है अनोखी 

ऐसा माना जाता है कि बस्‍तर जिले के पहले काकातिया राजा अन्‍नम देव वारंगल से यहां आए थे. उन्‍हें दंतेवश्‍वरी माता का वरदान मिला था. कहा जाता है कि अन्‍नम देव को माता ने वर दिया था कि जहां तक वे जाएंगे, उनका राज वहां तक फैलेगा. शर्त ये थी कि राजा को पीछे मुड़कर नहीं देखना था और माता उनके पीछे-पीछे जहां तक जाती, वहां तक की ज़मीन पर उनका राज हो जाता. अन्‍नम देव के रूकते ही मैय्या भी रूक जाने वाली थी.

अन्‍नम देव ने चलना शुरू किया और वे कई दिन और रात चलते रहे. वे चलते-चलते शंखिनी और डंकिनी नंदियों के संगम पर पहुंचे. यहां उन्‍होंने नदी पार करने के बाद माता के पीछे आते समय उनकी पायल की आवाज़ महसूस नहीं की और वे वहीं रूक गए और माता के रूक जाने की आशंका से उन्‍होंने पीछे पलटकर देखा. माता तब नदी पार कर रही थी. राजा के रूकते ही माता भी रूक गई और उन्‍होंने आगे जाने से इनकार कर दिया. दरअसल नदी के जल में डूबे पैरों में बंधी पायल की आवाज़ पानी के कारण नहीं आ रही थी और राजा इस भ्रम में पड़ गए कि पायल की आवाज़ नहीं आ रही है, शायद माता नहीं आ रही है सोचकर पीछे पलट गए.

 

शर्त के अनुसार माता के लिए राजा ने शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम पर एक सुंदर घर यानि मंदिर बनवा दिया. तब से माता वहीं स्‍थापित है. दंतेश्वरी मंदिर के पास ही शंखिनी और डंकिन नदी के संगम पर माँ दंतेश्वरी के चरणों के चिन्ह मौजूद है और यहां सच्चे मन से की गई मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *