जब कुली महिला की दासता सुनकर भावुक हुए राष्ट्रपति

वैसे तो दुनियाभर में कामकाज के मामले में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कंधा से कंधा मिलाकर कर आगे बढ़ रही है. मगर कुछ ऐसे भी काम होते है जो सिर्फ पुरुषों तक ही ठीक रहता है. मगर हालात और परिस्थिति जब मजबूर कर दे तो महिलाएं भी उस काम करने में अव्वल रहती है. ऐसा ही एक वाक्या है राजस्थान के जयपुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का भारी भरकम सामान उठाने वाली एक महिला कुली का. जी हां महिला के इसी हौसले को ध्यान में रखते हुए हालही में इस कुली महिला समेत महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा चुनी गई उन 112 महिलाओं को चुना जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में पहली महिला के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की. इस मौके पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने इन महिलाओं को संबोधित करते हुए कुली महिला की दासता को सुनकर बहुत ही भावुक हुए. तो चलिए आप भी जान लीजिये देश की पहली महिला कुली की दासता …!

जब भाई ने जयपुर आकर काम ढूंढने को कहा..

manju woman coolie kuchhnaya
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देश की पहली महिला कुली मंजू का कहना है ‘‘ पति की मौत के बाद तीन बच्चों के पालन-पोषण का भार सिर पर पड़ा. भाई ने जयपुर आकर काम ढूंढने को कहा. मैं आई तो सोचा क्यों न कुली ही बन जाऊ. मेरा वजन 30 किलोग्राम था और यात्रियों का बैग भी 30 किलोग्राम से ज्यादा ही होता था. परिवार चलाने के लिए इस भार को उठाने के सिवा कोई चारा नहीं था. छह महीने की ट्रेनिंग के बाद मैं जयपुर रेलवे स्टेशन पर कुली बन गई ”

भावुक हो गये राष्ट्रपति

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महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा 112 महिलाओं को चुना गया, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में पहली महिला के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की. इस मौके पर राष्ट्रपति ने इन महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा वे अपने काम व योगदान से देश की ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में काम करें. कहानियां तो सबके पास थीं, मगर संघर्ष की जो कहानी राष्ट्रपति भवन में मंजू ने सुनाई, उसे सुनकर राष्ट्रपति समेत लोग भावुक हो उठे. जयपुर रेलवे स्टेशन पर कुली बनकर बच्चों का पेट पालने वाली मंजू को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सम्मानित किया. फर्स्ट लेडीज नामक पहल के तहत देश की कुल 112 महिलाओं को राष्ट्रपति भवन में इस सम्मान समारोह के लिए चुना गया था, जिसमें मंजू का भी नाम था.

देश की बड़ी-बड़ी हस्तियों के साथ मिला सम्मान 

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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा- ” मैं कभी इतना भावुक नहीं हुआ, जितना बेटी मंजू की कहानी सुनकर द्रवित हुआ. ” मंजू ने 2013 में जयपुर रेलवे स्टेशन पर कुली का काम शुरू किया. अपने-अपने क्षेत्रों में उपलब्धियों के झंडे गाड़ने वालीं कुल 112 में से 90 महिलाएं राष्ट्रपति भवन सम्मान लेने पहुंचीं थीं.
देश की पहली महिला कुली मंजू देवी जब राष्ट्रपति भवन पहुंची तो उन्हें देखकर हर कोई दंग रह गया. अपने क्षेत्रों में पहचान बनाने के लिए सम्मान ग्रहण करते समय हर महिला ने अपनी कहानी सुनाई. जब मंजू ने जो कहानी सुनाई, उसने हर किसी को भावुक कर दिया. मंजू ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन वह राष्ट्रपति भवन जाकर सम्मान ग्रहण करेंगी, वो भी ऐश्वर्या राय, सानिया मिर्जा और पीवी सिंधू जैसी सेलिब्रेटीज के बीच बैठने का मौका मिलेगा. राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने सम्मानित महिलाओं को ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करने की सलाह दी. महिलाओं का चयन महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से किया गया था. इनमें विभिन्न स्रोतों के अलावा, मीडिया व सोशल मीडिया पर आई जानकारियों के आधार पर 227 महिलाओं को चुना गया, जिसमें अंतत: 112 महिलाओं को सम्मनित करने का फैसला किया गया। मंत्रालय ने महिलाओं के चयन के लिए विशेषज्ञों की एक जूरी बनाई, जिसने इन लिस्ट को तैयार करने में मदद की.

ममता ने बॉडी बिल्डिंग में कमाया नाम

Mamta Devi. woman body builder kuchhnaya

आमतौर पर बॉडी बिल्डिंग पुरुषों की दुनिया का माना जाता है, लेकिन ममता देवी ने पु़रुषों की इस एकाधिकार को चुनौती देने की कोशिश की और वह देश की पहली महिला बॉडी बिल्डर बनीं. उन्हें अपनी दुबली पतली व छहरही काया को परफेक्ट शेप में लाने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी. घंटों की एक्सरसाइज और मजबूत इच्छाशक्ति के चलते उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए खिताब जीते.

महिला विधायक ने सैनिटरी पैड बैंक बनाया

आज महिलाओं में पीरियड के दौरान हाइजीन को लेकर तमाम प्रयास हो रहे हैं और इस पर फिल्म भी बन चुकी है. ऐसे में महाराष्ट्र की बीजेपी विधायक भारती ने महिलाओं के लिए देश का पहला सैनिटरी पैड बैंक ही बना डाला है. मुंबई के वर्सोवा सीट से विधायक लवेकर को पता चला कि जब महिलाएं अपने पीरियड्स के दौरान राख, पत्तियां व गंदे कपड़े का इस्तेमाल करती हैं तो इस बात ने उन्हें बुरी तरह से झकझोर दिया. उन्हें लगा कि इस दिशा में काम करने की जरूरत है और तब उन्होंने सैनिटरी पैड का बैंक बनाने का ख्याल आया. जहां से ग्रामीण व आदिवासी महिलाओं को नियमित रूप से पैड दिए जाते हैं.

कश्मीर की पहली महिला पाइलट की कहानी

aayasha aziz kuchhnaya
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अशांति और आतंकी घटनाओं की वजह से चर्चा में रहने वाले कश्मीर से निकली एक 16 साल की किशोरी आयशा समाज की तमाम वर्जनाओं को पीछे छोड़ती प्लेन उड़ाना शुरू करती है और स्टूडेंट पाइलट का लाइसेंस हासिल करती है. 16-17 साल की उम्र में आयशा अजीज मिग 29 जैसे फाइटर प्लेन व सेसना 172 आर जैसे प्लेन उड़ा चुकी हैं. आयशा न सिर्फ देश की सबसे कमउम्र पाइलट हैं, बल्कि कश्मीर से आने वाली पहली महिला पाइलट भी हैं. साल 2016 में मुंबई प्लाइंग क्लब से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्हें कमर्शल पाइलट का लाइसेंस मिला.

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