जानिए.. कैसी होती हैं सुरक्षा और सुविधा दूसरे देश के प्रेसीडेंट, वॉइस प्रेसीडेंट या मिनिस्टर्स के भारत आने पार

भारत के प्रधान मंत्री दुनिया के किसी देश भी में या दुनिया के किसी भी प्रेसीडेंट, वॉइस प्रेसीडेंट या मिनिस्टर्स के भारत आने पर होता है सबसे गुप्त और सुरक्षित स्वागत. हालही में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इन दिनों भारत में आये. पर क्या आप जानते हैं कि जब किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भारत आते हैं तो उन्हें क्या सुविधाएं दी जाती हैं? उनकी सुरक्षा कैसे होती है? वे कहां रुकते हैं? आज ऐसे ही सवालों के जवाब हम देने जा रहे हैं…

मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स करता है पूरी तैयारी 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रूस, फ्रांस सहित कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके कंवल सिब्बल (रिटायर्ड) और मलय सिन्हा, भूतपूर्व सचिव सुरक्षा सिन्हा जो बतौर पीएम मोदी की सुरक्षा के इंचार्ज भी रह चुके के अनुसार मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर्स (MEA) में प्रोटोकॉल डिविजन है.

यही नोडल ऑफिस होता है जो किसी भी देश के प्रेसीडेंट, वॉइस प्रेसीडेंट या मिनिस्टर्स के भारत आने पर पूरा मैनेजमेंट देखता है. इस डिविजन को चीफ प्रोटोकॉल ऑफिसर द्वारा लीड किया जाता है. यही डिविजन भारत के प्रेसीडेंट, वॉइस प्रेसीडेंट, प्राइम मिनिस्टर आदि के बाहर जाने पर उनसे जुड़ा प्रोटोकॉल भी देखता है. प्रोटोकॉल डिविजन मुख्यतौर पर तीन सब-ऑफिसेज में बंटा होता है. हर एक को डिप्टी चीफ प्रोटोकॉल (DCP) द्वारा लीड किया जाता है. डीसीपी की मुख्य जिम्मेदारी विजिट्स को हेंडल करने की होती है.

कई बार तोड़ दिए जाते है प्रोटोकाल 

जब भी किसी देश से भारत में गणमान्य नागरिक आते हैं तो ऐसे में रेसिप्रोसिटी की पॉलिसी अपनाई जाती है. इसका मतलब ये होता है कि संबंधित देश में हमारे गणमान्य नागरिकों के जाने पर कैसा व्यवहार किया गया? वहां किस स्तर की सुविधाएं दी गईं? किस स्तर के अधिकारियों से मुलाकात हुई? कितनी देर मुलाकत हुई? उसी स्तर की सुविधाएं संबंधित राष्ट्र के प्रमुख के आने पर भारत में दी जाती हैं. हालांकि कई निर्णय राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं. पीएम प्रोटोकॉल तोड़कर भी कई गणमान्य नागरिकों का वेलकम करते हैं. ऐसा देशहित में किया जाता है.

सफर की तैयारी रहती है सुरक्षित और सुविधाजनक 

हर डिग्नेटरी के लिए सिक्योरिटी का मिनिमम प्रोटोकॉल तो फॉलो किया ही जाता है. काफिले में कितनी गाड़ियां होंगी, इमरजेंसी के लिए कौन सी गाड़ियां होंगी, ट्रैफिक क्लियर करने के लिए कौन सी टीम होगी, जैसी बातों को फॉलो किया जाता है.

अमेरिका, रूस जैसे देशों में फिक्स होता है प्रोटोकॉल

कुछ बड़े देश जैसे अमेरिका, रूस, फ्रांस में फिक्स प्रोटोकॉल होता है. यह देश अपने प्रोटोकॉल को लेकर काफी स्ट्रिक्ट होते हैं, जबकि इंडिया के प्रोटोकॉल में काफी फ्लेक्सिबिलिटी है. हमारे पीएम प्रोटोकॉल तोड़कर दूसरे राष्ट्र से आए डिग्नेटरी को रिसीव करने जाते हैं. ऐसा राष्ट्रहित में कई देश करते हैं. कई राष्ट्रों के प्रेसीडेंट्स यह चाहते भी हैं कि उन्हें प्रोटोकॉल तोड़कर रिसीव किया जाए. किसके लिए ऐसा करना है, और किसके लिए नहीं, यह राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर किया जाता है.

सिक्योरिटी के लिए पहले से आती है टीम

अधिकांश राष्ट्रों के प्रेसीडेंट या वॉइस प्रेसीडेंट के आने से पहले उनके देश की एक टीम विजिट पर आती है. यह टीम सिक्योरिटी की जांच करती है. उनके प्रमुख को जहां-जहां जाना है, वहां की सिक्योरिटी कैसी होगी? किस रूट से जाएंगे? ये सब देखा जाता है. इतना तक ध्यान रखा जाता है कि स्टेयर्स (सीढ़ियों) पर चढ़ना है तो उनके बीच कितना गैप है. अमेरिका और रूस जैसे देशों की सिक्योरिटी एजेंसी काफी हावी होती हैं. वे अपने हिसाब से हर एक जगह तय करते हैं. जबकि हमारे देश की एजेंसी किसी दूसरे देश में जाती है तो इतनी ज्यादा हावी नहीं हो पाती.

सब कुछ होता है पसंद का 

किसी भी फॉरेन डिग्नेटरी के साथ 8 से 10 मेम्बर की टीम जनरली होती है. हालांकि अमेरिका जैसे बड़े राष्ट्र के प्रेसीडेंट आते हैं तो और भी ज्यादा संख्या में मेम्बर्स आते हैं. ठहरने और खाने-पीने का इंतजाम संबंधित देश की एम्बेसी द्वारा ही देखा जाता है. जैसे हमारे देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री कहीं जाते हैं तब वे भी वहां भारतीय खाने ही लेना पसंद करते हैं. इसी तरह दूसरे देश से आने वाले डिग्नेटरी भी अपने फूड और कहां ठहरना है, इसका निर्णय खुद लेते हैं. यह काम संबंधित देश की एम्बेसी के जरिए किया जाता है. उनकी मांग के मुताबिक ही यहां इंतजाम किए जाते हैं.

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