जानिए… आखिर क्यूं बनाया गया था गेटवे ऑफ इंडिया और इंडिया गेट


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अक्सर लोग गेटवे ऑफ इंडिया और इंडिया गेट के नाम भ्रमित रहते है। ऐसा लगता है दोनों एक जैसे है और दोनों का निर्माण किसी द्वार के रुप है।

ये सत्य है की मुंबई स्थित गेटवे ऑफ इंडिया भारत प्रवेश द्वार जरुर मगर इन दोनों के इतिहास के आधार पर देखा जाय तो दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। आज इस लेख के माध्यम से दोनों ही स्मारकों के से जुड़ी रोचक बातों को बताएंगे…!

अंग्रजों का आखरी जहाज गेटवे ऑफ इंडिया हुआ था गेट आउट-:

गेटवे ऑफ इंडिया के बारे में कहा जाता है इसका निर्माण सन 1924 में हुआ था। जिसकी बुनियाद 31 मार्च, 1911 को इसकी रखी गई थी।

इस द्वार को 2 दिसंबर 1911 को पहली बार यहां आये ब्रिटेन के राजा रानी जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी का धन्यवाद करने और उनकी यात्रा की याद में नींव पड़ी थी।

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करीब एक दशक तक यह इमारत बनती रही और 1924 में पूरी तरह से बनकर तैयार हुई 4 दिसंबर, 1924 को वायसराय, अर्ल ऑफ रीडिंग ने इसका उद्घाटन किया।

इसका निर्माण भारत के अंदर आने और बाहर जाने वाले दरवाजे के तौर पर किया जाता रहा है। 1947 के बाद जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा तो उनका आखिरी जहाज यहीं से रवाना हुआ था।

हजारों सैनिकों के कुर्बानी की निशानी है इंडिया गेट-:


कभी किंग्सवे के नाम से पहचाने जाने वाले इंडिया गेट को सन् 1931 में बनाया गया था।

इंडिया गेट को पहले ऑल इंडिया वॉर मेमोरियल के नाम से जाना जाता था।

1914 से 1918 तक चले प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में ब्रिटिस इण्डियन आर्मी के लगभग 90,000 सैनिकों स्मृति में बनाया गया था। जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने में अपनी जान गँवा दी थी।

इंडिया गेट की दीवारों पर इन सैनिकों के लिखे हुए नामों को भी देखा जा सकता है।

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20वीं सदी में महान वास्तुकार हुआ करते थे सर एडविन लुटियंस। उन्होंने कई बिल्डिंग, युद्ध स्मारक और हवेली का डिजाइन किया था।

उनके नाम पर ही नई दिल्ली में एक इलाका लुटियंस दिल्ली के नाम से जाना जाता है।

लुटियंस ने ही इंडिया गेट का डिजाइन किया था। इंडिया गेट का डिजाइन फ्रांस के पैरिस में स्थित आर्क डे ट्रायम्फ से प्रेरित है।

इंडिया गेट के पास ही दिल्ली की सबसे मशहूर जगहों में से एक है कनॉट प्लेस।

इसका नाम ब्रिटेन के शाही परिवार के एक सदस्य ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया है। उसी ड्यूक ऑफ कनॉट ने 10 फरवरी, 1921 को इंडिया गेट की बुनियाद रखी थी।

यह स्मारक दस साल बाद बनकर तैयार हुआ। 12 फरवरी, 1931 को उस समय भारत के वायसराय रहे लॉर्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया था। हर साल गणतंत्र दिवस परेड राष्ट्रपति भवन से शुरू होती है और इंडिया गेट होकर गुजरती है।

आजादी के बाद इंडिया गेट में कुछ संशोधन भी किए गए हैं। इन संशोधनों के कारण इंडिया गेट भारतीय सेना के सैनिकों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल बन गया है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के समय अपने जीवन को गँवा दिया था।

अमर जवान ज्योति (अमर योद्धाओं की लौ) 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में अपनी जान गँवाने वाले भारतीय सैनिकों के सम्मान के लिए बहुत बाद में बनवाई गई थी।

इस स्मारक पर संगमरमर का आसन बना हुआ है। उस पर स्वर्ण अक्षरों में ‘अमर जवान’ लिखा हुआ है और स्मारक के ऊपर L1A1 आत्म-लोडिंग राइफल भी लगी हुई है, जिसके बैरल पर किसी अज्ञात सैनिक का हेलमेट लटका हुआ है।

इस स्मारक पर हमेशा एक ज्योति जलती रहती है जो अमर जवान की प्रतीक है। स्मारक के चारों कोने पर लौ है लेकिन साल भर एक ही लौ (ज्योति) जलती रहती है।

26 जनवरी और 15 अगस्त के मौकों पर चारों ज्योति जलती है।

साल 2006 तक इसको जलने के लिए एलपीजी का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन अब सीएनजी का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी सुरक्षा भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के जवान दिन-रात करते हैं।

26 जनवरी, 1972 को अमर जवान ज्योति के उद्घाटन के समय इंदिरा गांधी ने सैनिकों को श्रद्धांजलि दी थी।

तब से हर साल गणतंत्र दिवस के दिन (परेड से पहले) देश के प्रधानमंत्री, तीनों सेनाओं के प्रमुख और सभी मुख्य अतिथि अमर जवान ज्योति पर फूल चढ़ाकर सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं।

विजय दिवस के मौके पर भी तीनों सेनाओं के प्रमुख सैनिकों को श्रद्धांजलि देते है।


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