जानिए…आखिर क्यूं कहते है जनवरी को जनवरी…, और कैसे हुआ हिंदी महीनों का नामकरण..?

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भारत में प्राचीन काल से समय मापने के लिए हिन्दू कैलेंडर का इस्तेमाल होता आ रहा है. आज के समय कई क्षेत्रीय कैलेंडर जैसे पंजाबी कैलेंडर, बंगाली कैलेंडर, ओड़िया, मलयालम, तमिल, कन्नड़, तुलु जो महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश में इस्तेमाल किये जाते है.

गौरतलब है की, कैलेंडर सूर्य और चन्द्र दोनों के चाल अनुसार तैयार किये जाते है, मगर इस चाल का मापन खगोल विज्ञान और धार्मिक पंचांग के आधार पर होता है. सभी कैलेंडर में 12 महीने होते है और उनके नाम अलग-अलग होते है.

जैसे की हम जानते है की, हर किसी घटना या नाम के पीछे कोई न कोई रहस्‍य या इतिहास जरूर होता है. वैसे ही इन 12 महीनों के नामकरण के पीछे भी कई तर्क और महत्त्व है. आइए आज हम आपको बताते हैं इन नामों का इतिहास…

रोमन देवता 'जेनस'kuchh naya
The Conversation

अंग्रेजी महीनों के नाम के पीछे का तर्क और महत्व-:

अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक साल का पहला महीना जनवरी आता है. जनवरी का नामकरण रोमन देवता ‘जेनस’ के नाम पर हुआ. मान्यता है कि जेनस के दो चेहरे हैं. एक से वह आगे तथा दूसरे से पीछे देखता है.

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जनवरी ( January)-:

इसी तरह जनवरी के भी दो चेहरे हैं. एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है तथा दूसरे से अगले वर्ष को. जेनस को लैटिन में जैनअरिस कहा गया. जेनस जो बाद में जेनुअरी बना जो आगे चलकर जनवरी हो गया.

फरवरी (February)-:

फरवरी इस महीने का संबंध लेटिन के फैबरा से है. इसका अर्थ है ‘शुद्धि की दावत’. पहले इसी माह में 15 तारीख को लोग शुद्धि की दावत दिया करते थे.

कुछ लोग फरवरी नाम का संबंध रोम की एक देवी फेबरुएरिया से भी मानते हैं. जो संतानोत्पत्ति की देवी मानी गई है. इसलिए महिलाएं इस महीने इस देवी की पूजा करती थी ताकि वे प्रसन्न होकर उन्हें संतान होने का आशीर्वाद दें.

आक्रमण करने वाला महीना मार्च (March)-:

रोमन देवता ‘मार्स’ के नाम पर मार्च महीने का नामकरण हुआ है. रोमन वर्ष का प्रारंभ इसी महीने से होता था. मार्स मार्टिअस का अपभ्रंश है जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. सर्दियां समाप्त होने पर लोग शत्रु देश पर आक्रमण करते थे इसलिए इस महीने को मार्च नाम से पुकारा गया.

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बसंत का महीना अप्रैल (April)-:

अप्रैल इस महीने की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘एस्पेरायर’ से हुई. इसका अर्थ है खुलना. रोम में इसी माह कलियां खिलकर फूल बनती थी. अर्थात बसंत का आगमन होता था इसलिए प्रारंभ में इस माह का नाम एप्रिलिस रखा गया.

इसके पश्चात वर्ष के केवल दस माह होने के कारण यह बसंत से काफी दूर होता चला गया. पर जब वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के सही भ्रमण की जानकारी से दुनिया को अवगत कराया तब वर्ष में दो महीने और जोड़कर एप्रिलिस का नाम पुनः सार्थक किया गया.

बड़े-बुजुर्ग रईस का महीना मई (May)-: 

रोमन देवता मरकरी की माता ‘मइया’ के नाम पर मई महीने का नामकरण हुआ. मई का तात्पर्य ‘बड़े-बुजुर्ग रईस’ हैं. मई नाम की उत्पत्ति लैटिन के मेजोरेस से भी मानी जाती है.

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शादी का महीना जून (June)-:

जून महीने में लोग शादी करके घर बसाते थे. इसलिए परिवार के लिए उपयोग होने वाले लैटिन शब्द जेन्स के आधार पर जून माह का नामकरण हुआ.

एक अन्य मतानुसार, जिस प्रकार हमारे यहां इंद्र को देवताओं का स्वामी माना गया है. उसी प्रकार रोम में भी सबसे बड़े देवता जीयस हैं. एवं उनकी पत्नी का नाम है जूनो. इसी देवी के नाम पर जून का नामकरण हुआ है.

जूलियस से बना जुलाई (जुलाई)-:

रोम का महान सम्राट जूलियस सीजर का जन्म एवं मृत्यु दोनों जुलाई में हुई. इसलिए इस महीने का नाम जुलाई कर दिया गया.

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आगस्टस से बना अगस्त (August)-:

जूलियस सीजर के भतीजे आगस्टस सीजर ने अपने नाम को अमर बनाने के लिए सेक्सटिलिस का नाम बदलकर अगस्टस कर दिया जो बाद में केवल अगस्त रह गया.

सैप्टेंबर से बना सितंबर (September)-:

रोम में सितंबर को सैप्टेंबर कहा जाता था. सैप्टैंबर में सैप्टै लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है सात एवं बर का अर्थ है वां. यानी सैप्टैंबर का अर्थ सातवां, किन्तु बाद में यह नौवां महीना बन गया.

आक्ट से बना अक्टूबर (October)-:  

अक्टूबर को लैटिन में ‘आक्ट’ (आठ) के आधार पर अक्टूबर या आठवा कहते थे. किंतु दसवां महीना होने पर भी इसका नाम अक्टूबर ही चलता रहा.

नोवेम्बर से बना नवंबर (November)-:

नवंबर को लैटिन में पहले ‘नोवेम्बर’ यानी नौवां कहा गया. ग्यारहवां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला एवं इसे नोवेम्बर से नवंबर कहा जाने लगा.

डेसेम से बना दिसंबर (December)-: 

इसी प्रकार लैटिन डेसेम के आधार पर दिसंबर महीने को डेसेंबर कहा गया. डेसेंबर में से डेसे लैटिन शब्द है. जिसका अर्थ है दस. किंतु वर्ष का 12वां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला.

हिंदू पंचांग के मुताबिक महीनों के नाम-:

हिन्दू कैलेंडर में भी अंग्रेजी कैलेंडर की तरह 12 महीने होते है. जिसमें लगभग 29.5 दिन हर महीने में होते है. महीने में दो पखवाड़े 15-15 दिन के होते है. ढलते चांद के बाद अमावस्या आती है एवं प्रकाशमय चांद के बाद पूर्णिमा आती है.

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महीने का पहला दिन अलग – अलग कैलेंडर के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है. ज्यादातर उत्तर भारत में पूर्ण चंद्रमा जिस दिन निकलता है, उसे महीने का पहला दिन माना जाता है. जबकि दक्षिण भारत में अमावस्या के दिन को महीने का पहला दिन मानते है.

लेकिन हिन्दू कैलेंडर की खास बात यह है की, महीनों के नाम राशियों के अनुरूप रखे गए है. हर महीने का अपना एक महत्व है और सभी महीने के अपने त्यौहार व पर्व है.

चैत्र (मेष राशी) –:

ये हिन्दू कैलेंडर का पहला महिना होता है. इस महीने से ग्रीष्म ऋतू की आहट शुरू हो जाती है. ये माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च-अप्रैल महीने में आता है. वहीं बंगाली एवं नेपाली कैलेंडर के अनुसार चैत्र साल का आखिरी महिना होता है.

चैत्र महीना शुरू होने से 15 दिन पहले फाल्गुन में होली का त्यौहार मनाया जाता है. चैत्र महीने के पहले दिन महाराष्ट्र में गुड़ी पाड़वा, तमिलनाडु में चैत्री विशु और कर्नाटका एवं आंध्रप्रदेश में युगादी का त्यौहार मनाया जाता है.

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उत्तरी और मध्य भारत में चैत्र के पहले दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है. इसके नौवे दिन भगवान् राम का जन्मदिन ‘रामनवमी’ के रूप में मनाते है. चैत्र माह के आखिरी पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाते है.

बैसाख (वृषभ) –:

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार ये दूसरा महीना है. लेकिन नेपाली, पंजाबी एवं बंगाली कैलेंडर का ये पहला महीना होता है.

ये माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अप्रैल-मई महीने में आता है. इस महीने का नाम बैसाख इसलिए पड़ा क्योंकि इस समय सूर्य की स्तिथि विशाखा तारे के पास होती है.

बैसाख आने पर बंगाली में न्यू इयर मनाया जाता है. इसके साथ ही बांग्लादेश एवं पश्चिम बंगाल में इस समय लोग नए काम की शुरुवात करते है.

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पंजाब में किसान लोग कटाई का पर्व ‘बैसाखी’ महीने में मनाते है. साथ ही यह उनका नया साल भी होता है. बौद्ध धर्म के लोग बैसाख की पूर्णिमा को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाते है. इस दिन गौतम बुद्ध का जन्म उत्सव मनाया जाता है. ये ज्यादातर मई में आने वाली पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है.

ज्येष्ठ (मिथुन राशि) –:

ज्येष्ठ महीने के दिन अत्याधिक गर्मी वाले होते है. यह महीना मई-जून के आस पास आता है. इसे तमिल में आणि माह कहते है. ज्येष्ठ माह के अमावस्या के दिन शनि जयंती मनाई जाती है.

देश के उत्तरी भाग में ज्येष्ठ माह की दशमी के दिन गंगा दशहरा मनाते है. कहते है इस दिन गंगा जी धरती पर अवतरित हुई थी. ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष एकादशी को निर्जला एकादशी होती है. साल में पड़ने वाली सभी 24 एकादशी से इसका महत्व बहुत है.

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ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश में वट पूर्णिमा या वट सावित्री का व्रत रखते है.

जगन्नाथ पूरी में स्नान यात्रा त्यौहार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन मनाते है. इस दिन जगन्नाथ मंदिर से बालभद्र, सुभद्रा, जगन्नाथ को मंदिर से बाहर ले जाकर स्नान बेदी में स्नान कराया जाता है.

अषाढ़ ( कर्क राशी) –:

तमिल में इस महीने को आदि कहते है. ये माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जून-जुलाई महीने में आता है. अषाढ़ महीने के पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा होती है. तमिलनाडु में आदि अमावस्या का विशेष महत्व है.

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सावन (सिंह) –:

सावन का महिना हिन्दू कैलेंडर के अनुसार सबसे पवित्र माना जाता है. इस महीने से अनेकों त्यौहार शुरू हो जाते है.

ये माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जुलाई-अगस्त महीने में आता है. ये पूरा महिना शिव जी को समर्पित है. जब सूर्य, सिंह राशी में आता है तब सावन महीने की शुरुआत होती है.

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कई हिन्दू पुरे सावन माह व्रत रखते है, तो कई सावन के हर सोमवार का व्रत रखते है. सावन महीने में रक्षाबंधन के साथ महाराष्ट्र में इस दिन नारली पूर्णिमा मनाई जाती है. पूर्णिमा के आठ दिन बाद जन्माष्टमी, अमावस्या के पांच दिन बाद नागपंचमी का त्यौहार होता है.

भाद्रपद (कन्या राशी) –:

भादों/भाद्रपद अगस्त-सितम्बर महीने में आता है. जिसे पुरात्तासी भी कहते है. इस महीने की शुरुआत में ही हरितालिका तीज, गणेश चतुर्थी, ऋषि पंचमी आती है.

अष्टमी के दिन राधा अष्टमी, चौदस के दिन अनंत चतुर्दशी मनाते है. इसके बाद 15 दिन पितृ पक्ष के होते है. इस दौरान पितरों को तर्पण दिया जाता है.

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अश्विन (तुला राशी) –:

इस महीने को कुआर भी कहते है. भाद्र पक्ष की अमावस्या के बाद ये दिन शुरू होता है. ये माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार सितम्बर- अक्टूबर महीने में आता है. नवरात्री, दुर्गापूजा, कोजागिरी पूर्णिमा, विजयादशमी/दशहरा, दिवाली, धनतेरस, काली पूजा इसी महीने में आते है.

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कार्तिक (वृश्चिक) – :

गुजरात में दिवाली से नया साल शुरू होता है, वहां कार्तिक पहला महिना होता है. ये माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अक्टूबर-नवम्बर महीने में आता है. इस माह गोबर्धन पूजा, भाई दूज, कार्तिक पूर्णिमा मनाते है.

इस माह के एकादशी को देव उठनी एकादशी मनाते है. जिसे तुलसी विवाह भी कहा जाता है. इस दिन के बाद से शुभ कार्यों की शुरुआत की जाती है. इस महीने गुरु नानक जयंती भी आती है.

अगहन (धनु राशि) –:
इस महीने को वैकुण्ठ एकादशी यानी मोक्ष एकादशी भी कहते है, जिसे बड़ी धूमधाम से मनाते है. ये माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार नवम्बर – दिसम्बर महीने में आता है.

पौष (मकर राशि) –:

पौष का महीना दिसम्बर-जनवरी के समय आता है. यह ठण्ड का समय होता है, जिसमें अत्याधिक ठण्ड पड़ती है. इस महीने लौहड़ी, पोंगल एवं मकर संक्राति जैसे कई त्यौहार मनाये जाते है.

माघ (कुंभ राशि) –:

इस महीने सूर्य कुंभ राशी में प्रवेश करता है. तमिल में इस महीने को मासी कहते है. यह माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जनवरी-फरवरी महीने में आता है.

इस महीने विद्या एवं कला की देवी सरस्वती जी की पूजा बसंत पंचमी के दिन की जाती है. इसके साथ ही महाशिवरात्रि, रथ सप्तमी त्यौहार भी मनाये जाते है.

फाल्गुन (मीन राशि) – :

बंगाल में ये 11 वां महीना होता है. बांग्लादेश में फाल्गुन महीने के पहले दिन पोहेला फाल्गुन मनाया जाता है. नेपाल में फाल्गुन के पहले दिन रंगों का त्यौहार होली को बड़ी धूमधाम से मनाते है, जिसे वहां फागु कहते है. वहीं भारत में भी फाल्गुन पूर्णिमा को होली मनाई जाती है. यह माह अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार फरवरी- मार्च महीने में आता है.

पुरषोत्तम माह (अधिक मास) –:

ये हिन्दू माह का अतिरिक्त महिना होता है, जो 32 महीने और 16 दिन के बाद आता है. अधिक मास का हिन्दुओं में बेहद महत्व है. सौर वर्ष और चंद्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चन्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है. इसी को अधिक मास या अधिमास या मलमास कहते हैं.

सौर-वर्ष का मान 365 दिन, 15 घड़ी, 22 पल और 57 विपल हैं. जबकि चंद्र वर्ष 354 दिन, 22 घड़ी, 1 पल और 23 विपल का होता है. इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष 10 दिन, 53 घंटे, 21 पल (अर्थात लगभग 11 दिन) का अंतर पड़ता है. इस अंतर में समानता लाने के लिए चंद्र वर्ष 12 मासों के स्थान पर 13 मास का हो जाता है.

वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्त्पन्न हो जाती है, क्योंकि जिस चंद्रमास में सूर्य-संक्रांति नहीं पड़ती, उसी को “अधिक मास” की संज्ञा दे दी जाती है. तथा जिस चंद्रमास में दो सूर्य संक्रांति का समावेश हो जाय, वह “क्षयमास” कहलाता है.

क्षयमास केवल कार्तिक, मार्ग व पौस मासों में होता है. जिस वर्ष क्षय-मास पड़ता है, उसी वर्ष अधि-मास भी अवश्य पड़ता है. परन्तु यह स्थिति 19 वर्षों या 141 वर्षों के पश्चात् आती है.

स्रोत- विकिपीडिया, जागरण, deepawali.co.in

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