जानिए… आखिर एक नेता की सुरक्षा और सुविधा पर कितना होता है खर्च

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फरवरी महीने में जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में सीआरपीएफ काफिले पर हुए आतंकी हमले के बाद केंद्र सरकार ने कई अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा को हटा दिया गया था. लेकिन राज्यपाल की अनुशंसा पर फिर से कश्मीरी नेताओं को सुरक्षा बहाल कर दी गयी. मगर क्या आप जानते है? की हर साल देश भर के ऐसे कई नेताओं के सुरक्षा और सुविधा पर कितना खर्च होता है. नहीं जानते तो इस लेख को जरूर पढ़े…!

जनता के पैसों पर ऐश-:

भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है. जो कुल 29 राज्यों में विभाजित है. संपूर्ण राज्य और देश का संचालन मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अपने विधायकों एवं सांसदों के सहयोग से संचालित करते है.

जिसके एवज में केंद्र और राज्य सरकारें सभी का उनके पदानुसार वेतन और भत्ता निर्धारित करती है. इसके अलावा इनकी सुरक्षा में तैनात सुरक्षा कर्मियों का खर्च भी सरकारों को ही उठाना पड़ता है. जो आम जनता से ही वसूला जाता है.

सांसदों और विधायकों की सुविधा और सुरक्षा पर खर्च-:

देश के सभी राज्यों की संख्या के मुताबिक करीब कुल 4582 विधायकों की सीटें गई जो हर पांच साल के चुनाव के बाद किसी एक व्यक्ति को पदस्थ किया जाता हैं.

वर्ष 2018 के एक आकड़ो के मुताबिक इनके वेतन पर कुल 750 करोड़ रुपए खर्च होते हैं.

वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट अनुसार एक सांसद पर हर महीने बतौर वेतन और भत्ते पर 2 लाख 70 हजार खर्च होते हैं. देश में कुल 790 सांसद हैं. इस हिसाब से 790 सांसदों के वेतन और भत्ते पर हर महीने 21 करोड़ 33 लाख रुपए खर्च होते हैं और हर साल 255 करोड़ 96 लाख रुपये.

जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेताओं पर होने वाला खर्च-:

राज्य सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक अलगाववादियों पर सालाना 100 करोड़ रुपये खर्च हो रहा है. इसमें उनकी सुरक्षा पर केंद्र सरकार की रकम भी शामिल है.

बता दें कि, कश्मीर के अलगाववादियों पर हो रहे खर्च का ज्यादातर हिस्सा केंद्र सरकार उठाती रही है. 90 फीसदी हिस्सा केंद्र तो जम्मू-कश्मीर सरकार सिर्फ 10 फीसदी खर्चा ही उठाती है.

पिछले पांच साल में 309 करोड़ तो सिर्फ अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा में लगे जवानों पर खर्च किए गए. साल 2010 से 2016 तक 150 करोड़ रुपये PSO यानी निजी सुरक्षा गार्ड के वेतन पर खर्च हुए.

पांच साल में इन पर 506 करोड़ का खर्चा आया है जो कि जम्मू-कश्मीर के स्टेट बजट से भी ज्यादा है. बता दें कि सूबे का बजट 484.42 करोड़ है.

मीरवाइज मोहम्मद उमर फारूक -:

कश्मीर घाटी के एक अलगाववादी नेता पर तो औसतन 20 सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं. मीरवाइज उमर फारुख जम्मू-कश्मीर में हुर्रियत सम्मेलन के दो प्रमुख गुटों में से एक अवामी एक्शन कमेटी के अध्यक्ष हैं.

जिनकी सुरक्षा में करीब 5 करोड़ रुपये खर्च होते है. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, कश्मीर की ‘आजादी’ की मांग करने वाला सबसे बड़ा संगठन है.

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मीरवाइज को सबसे ज्यादा सुरक्षा मुहैया कराई जाती है. उन्हें जेड श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है. उनकी सुरक्षा में इंस्पेक्टर रैंक का अधिकारी तैनात रहता है. उनके सुरक्षाकर्मियों के वेतन पर एक दशक में पांच करोड़ खर्च किए गए.

ज्ञात हो की, अक्टूबर 2014 में जॉर्डन के ‘रॉयल इस्लामिक स्ट्रेटेजिक स्टडीज सेंटर’ ने मीरवाइज को 500 सबसे प्रभावशाली मुस्लिमों की सूची में शामिल किया था.

अब्दुल गनी बट-:

कश्मीर में अलगाववाद का समर्थन करने वाले अब्दुल गनी बट पर सुरक्षा में ढाई करोड़ रुपये का खर्चा आता है.

अब्दुल गनी बट वहीं शख्स है जिसे दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में फरवरी 1986 को अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों के मंदिर और घरों को जलाने में दोषी पाया गया था.

चौथी दुनिया

बट ने नौ माह जेल में काटने के बाद मुस्लिम संयुक्त मोर्चा नामक राजनीतिक संगठन बनाया. हैरान की बात यह है की, बट के भाई की हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने हत्या कर दी थी.

इसके बावजूद वह कश्मीर में अलगाववाद का समर्थन करते हैं. बट को सरकारी सुरक्षा के नाम पर चार सुरक्षाकर्मी प्रदान किए गए हैं.

बिलाल लोन-:

अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सदस्य बिलाल लोन पर भी सुरक्षा के तौर पर ढ़ाई करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं.

वर्ष 2014 में लोन ने भाजपा से नजदीकियां बढ़ाईं. 2014 के चुनाव में भाजपा-पीडीपी गठबंधन के साथ उनकी पार्टी भी शामिल हुई थी. बिलाल, सज्जाद लोन के बड़े भाई हैं. सज्जाद और बिलाल जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के वरिष्ठ सदस्य थे.

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इस संगठन की स्थापना अलगाववादी नेता अमानुल्लाह खान ने की थी. सरकारी सुरक्षा के नाम पर छह से आठ पुलिसकर्मियों के गार्ड के अलावा एक सिक्योरिटी वाहन भी सज्जाद को दिया गया है. सज्जाद की पत्नी आसमा पाकिस्तानी नागरिक अमानुल्लाह खान की इकलौती बेटी हैं.

अमानुल्लाह खान परिवार के साथ 1987 तक इंग्लैंड में रहता था. लेकिन आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की बात का खुलासा होने पर उसे वहां से प्रत्यर्पित कर दिया गया.

इसके अलावा जम्मू कश्मीर में ऐसे दर्जनों अलगाववादी नेता है, जिनपर केंद्र सरकार करोड़ों खर्च करती है जो पूरे देश की आम जनता का पैसा होता है.

स्रोत- हिंदुस्तान, NBT, ABP

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