चाणक्य के मृत्यु की दिलचस्प कहानी

चाणक्य को कौन नहीं जानता?

चन्द्रगुप्त मौर्य के बड़े ताकतवर “मौर्य” साम्राज्य की स्थापना जिस कुशाग्र बुद्धिजीवी के मार्गदर्शन से हुई, जिन्होंने अर्थशात्र नामक ग्रन्थ की रचना कर राजव्यवस्था, कृषी, न्याय, और राजनीति जैसे कई मुल्य को स्थापित किया वो….कौटिल्य….वही चाणक्य…!!!

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चाणक्य के मृत्यु के प्रति कई शोधकर्ताओ में मतभेद हें. लेकिन कई जैन धर्म ग्रन्थ में एक कहानी पाई गयी हें.

अपने प्रिय शिष्य चन्द्रगुप्त के प्रति चाणक्य का केवल विश्वास ही नहीं स्नेह भी था.

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और इसी स्नेह के खातिर चाणक्य चन्द्रगुप्त के अन्न में विष प्रयोग करते थे.

अर्थात चाणक्य का हेतु शूद्ध सरल था. मौर्य साम्राज्य का झंडा का प्रसार क्षेत्रीय सीमाओं में हो रही थी। उसीके वजह से चन्द्रगुप्त के कई शत्रु थे. अपने राजा पे कभी-भी विष प्रयोग हो सकता हें ये खतरे की बात चाणक्य जानते थे. तो ऐसा कभी भविष्य में हुआ तो रजा की जहर को प्रतिरोध करने की शक्ति बनाये रखने क लिए राजा के अन्न में हर दिन थोड़ा-थोड़ा जहर मिलाया जाता था.

एक दिन रानी दुर्धर ने राजा के लिए बनाये गए भोजन का अस्वाद लिया. उस समय वो गर्भवती थी और जल्द ही एक सप्ताह में प्रसुत होने वाली थी.

अचानक, ग्रहण किये गए अन्न जिसमे विष था उस वजहसे रानी को वेदना होने लगे और वो चिल्लाने लगी. चाणक्य दुसरे कक्ष में थे, वो भाग के आए और परिस्तिथि को जाना .

कुछ भी हो जय बस राजा का वंश रहना चाहिए, और उसे विषबाधा नहीं होनी चाहिए इसीलिए चाणक्य के ने शिशु को जलधि उसके माता के पेट से बहार निकाला पर रानी की मृत्यु हो गयी.

यह बोला जाता हैं की उस जहर की एक बूंद बच्चे के माथे को छुआ और इस के वजहसे बच्चे के माथे पर ब्लू स्पॉट पड़ा …. यही दूसरा मौर्य सम्राट … राजा बिन्दुसार … सम्राट अशोक के पिता..

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बिन्दुसार बड़ा हुआ , राजा बना. चन्द्रगुप्त ने सन्यास लिया पर चाणक्य तभ भी बिच-बिच में बिन्दुसार का मार्गदर्शन करते थे.

बिन्दुसार का प्रधान – सुबंधु- चाणक्य का द्वेष करता था. उसने राजा को उसके जनम और उसके माँ की मृत्यु की कथा सुनाई. अपनी माँ पर चंक्याने विषप्रयोग किया ऐसा समजकर बिन्दुसार चाणक्य पे बहोत गुस्सा हुए .

व्यथित चाणक्य सब कुछ त्याग कर मृत्यु के लिए अन्नं पानी का भी त्याग दिया. आगे जाकर जब सत्य बिन्दुसार को जब सच्चाई का पता चला तब उसने चाणक्य से क्षमा मांगी. पर एक बार जो थाना वो करने वाले चाणक्य ने राजा की बात नहीं मानी और उनका स्वर्गवास हो गया.

अन्न पानी त्याग कर देह रखने की ये प्रथा आज भी जैन संप्रदाय  में होती हें.

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