जब रोका था भारत ने नहरों का पानी तो पाकिस्तान ने झेली थी भयानक तंगी

सन 1960 में सिंधु नदी समझौते के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के बीच तीन बार युद्ध हुए, लेकिन सिंधु जल संधि पर किसी विवाद की नौबत नहीं आई। मगर 14 फरवरी 2019 के पुलवामा आतंकी हमले के बाद आतंकियों के पनाहगाह पाकिस्तान पर हर तरफ से दबाव बढ़ रहा है। पाकिस्तान को घेरने के लिए आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर कई कदम उठाये गए हैं। इसी बीच, भारत आने वाले दिनों में पाकिस्तान का पानी रोकने की तैयारी कर रहा है। ये पहला मौका नहीं जब भारत ने नदियों का पानी रोकने का ऐलान किया है। इससे पहले भी नदियों के पानी को लेकर विरोध हो चुका है। तो आइए जानते है कि नदियों के पानी को लेकर कितनी बार विवाद हो चुके है….!

नदियों के जल उपयोगिता को लेकर भारत-पाक के बीच विश्व बैंक ने की थी मध्यस्थता-:

amar ujala

अंग्रेजों से मिली आजादी के चंद दिनों बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान बटवारे के बाद दोनों देशों के बीच के रिश्ते कभी सौहार्दपूर्ण नहीं रहे। नतीजतन सीमा पर विवाद होता रहा है, आतंकियों की घुसपैठ होती रही और अलगाववादियों को उकसाया जाता रहा। बटवारे के समय बहुत सारी भौतिक वस्तुओं और सुविधाओं का बटवारा हुआ। साथ ही प्राकृतिक चीजों का भी बटवारा हुआ जिसमे जंगल, जमीन, नदिया सब शामिल था। एक ऐसा ही समझौता था सिंधु नदी का। जिसको लेकर खूब बवाल भी हुआ।

amar ujala

सिंधु जल संधि दो देशों के बीच पानी के बंटवारे की वह व्यवस्था है जिस पर 19 सितम्बर, 1960 को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने कराची में हस्ताक्षर किए थे। इसमें छह नदियों ब्यास, रावी, सतलुज, सिंधु, चिनाब और झेलम के पानी के वितरण और इस्तेमाल करने के अधिकार शामिल हैं। इस समझौते के लिए विश्व बैंक ने मध्यस्थता की थी।

इस समझौते पर इसलिए हस्ताक्षर किया गया क्योंकि सिंधु बेसिन की सभी नदियों के स्रोत भारत में हैं (सिंधु और सतलुज हालांकि चीन से निकलती हैं). समझौते के तहत भारत को सिंचाई, परिवहन और बिजली उत्पादन के लिए इन नदियों का उपयोग करने की अनुमति दी गई है, जबकि भारत को इन नदियों पर परियोजनाओं का निर्माण करने के लिए काफी बारीकी से शर्तें तय की गईं कि भारत क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता है।

तीन नदियों पर भारत का पूर्ण अधिकार-:

India Water Portal

इस संधि के तहत तीन ‘पूर्वी नदियां’ ब्यास, रावी और सतलुज के पानी का इस्तेमाल भारत बिना किसी बाधा के कर सकता है। वहीं, तीन ‘पश्चिमी नदियां’ सिंधु, चिनाब और झेलम पाकिस्तान को आवंटित की गईं हैं।

दोनों देशों के बीच तीन युद्धों के बावजूद यह संधि बनी रही है। संधि के शर्तों के मुताबिक संधि दोनों पक्षों के बीच ‘आपसी सहयोग और विश्वास’ पर ही टिकी होती है। मगर लगातार पकिस्तान की तरफ से हो रहे विश्वासघात से संधि के खंडित होने के आसार बढ़ गए है।

भारत ने रोका पानी तो पाकिस्तान ने झेली थी पानी की भयानक तंगी-:

1 अप्रैल 1948 को भारतीय पंजाब ने पाकिस्तान को जाने वाली नहरों का पानी रोक दिया ताकि पूर्वी पंजाब के असिंचित क्षेत्रों के लिये सिंचाई व्यवस्था की जा सके। इससे पाकिस्तानी पंजाब में पानी की भयानक तंगी के हालात पैदा हो गए। इसे देखते हुए 30 अप्रैल 1948 को पाकिस्तानी पंजाब को पानी बहाल कर दिया गया।

सिंधु संधि खंडित हो या न हो मगर पुलवामा घटना के बाद भारत पाकिस्तान और आतंकियों के खिलाफ लगातार एक के बाद एक कार्रवाई कर रहा है। जिसमे 21 फरवरी को केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से ये ऐलान किया की अब पाकिस्तान बूंद-बूंद पानी के लिए तरसेगा। जिनके मुताबिक, भारत के तीन पूर्वी नदियां’ ब्यास, रावी और सतलुज के अधिकार का पानी प्रोजेक्ट बनाकर पाकिस्तान के बजाय यमुना में छोड़ा जाएगा। मालूम हो कि व्यास, रावी और सतलज नदियों का पानी भारत से होकर पाकिस्तान पहुंचता है।

स्रोत-विकिपीडिया, hindi.news18.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *