यहां मिलता है सैकड़ों पूर्वजों का लेखा-जोखा

अगर हम अपने पूर्वजों को याद करना चाहे तो ज्यादा से ज्यादा तीन या 10 पीढ़ी तक के लोगों का नाम याद कर पाते है। मगर भारत में ऐसी भी दो जगहे है जहां कई पूर्वजों के नाम का विवरण सैकड़ों साल से संजो कर रखा जाता है। यदि आप अपने पूर्वज का नाम जानना चाहेंगे तो संपूर्ण विवरण के साथ जान सकते है। जी हां हम बात कर रहे है हरिद्वार और प्रयाग की। जहां के पंडों के पास अपने यजमानों की पूरी वंशावली मौजूद रहती है। तो चलिए जानते है किस तरह से और कब से ये परंपरा चली आ रही….

पुरोहितों के पास है भगवान राम का ब्यौरा,  झांसी की रानी के प्रयाग आने की भी जानकारी-:

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हरिद्वार और प्रयाग में यजमानों के पूर्वजों का लेखा-जोखा रखने की परंपरा सदियों पुरानी है। प्रयाग के पुरोहितों के पास तो भगवान राम का भी ब्यौरा है। दरअसल जब भगवान राम ने लंका विजय के बाद प्रयाग में स्नान के बाद पुरोहित को दान देना चाहा लेकिन ब्रह्महत्या का आरोप लगाकर उनसे किसी ने दान नहीं लिया। उसके बाद उन्हें अयोध्या के तत्कालीन कवीरापुर, बट्टपुर जिले के रहने वाले कुछ लोगों को ब्राह्मणों को यहां लाए और स्नान कर उन्हें दान दिया था।

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यही नहीं पुराहितों की बहियों में यह भी दर्ज है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई कब प्रयाग आई थीं। इसके आलावा इनके पास नेहरू परिवार के लोगों के लेख और हस्ताक्षर भी मौजूद हैं। इस प्रथा के लिए प्रयाग के पुराने पुरोहितों के वंशजों के पास ऐसे कागजात भी हैं जब अकबर ने प्रयाग के तीर्थ पुरोहित चंद्रभान और किशनराम को 250 बीघा भूमि मेला लगाने के लिए मुफ्त दी थी। जिसका फरमान भी उनके पास सुरक्षित है।

राजा-महाराजाओं और मुस्लिम शासकों का भी है ब्यौरा-:

तीर्थराज प्रयाग में अत्याधुनिक दौर में भी पुरोहित अपने यजमानों राजा-महाराजाओं और मुस्लिम शासकों से लेकर देशभर के अनगिनत लोगों की पाच सौ वर्षों से अधिक की वंशावलियों के ब्योरे बहीखातों में पूरी तरह संभाल कर रखते हैं।

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प्रयाग में कुंभ के दौरान करीब 1000 तीर्थ पुरोहितों की झोली में रखे बही-खाते बहुत सारे परिवारों, कुनबों और खानदानों के इतिहास का ऐसा दुर्लभ संकलन हैं जिससे कई बार उसी परिवार का व्यक्ति ही पूरी तरह वाकिफ नहीं होता है। जबकि हरिद्वार में ऐसे 2500 पंडित है जो सैकड़ों साल पुराने करोड़ों यजमानों के लेखा-जोखा की जिम्मेदारी संभाल रहे है।

शदियों से है हस्तलेखन की परंपरा-:

पुरोहितों या पंडितों के पास अपने यजमानों की पूरी वंशावली मौजूद रहती है। उसमें हर साल नए और मर चुके यजमानों का विवरण दर्ज करते हैं। यह वंशावली पूरी तरह से हस्तलिखित और सर्वमान्य है। बोलचाल की भाषा में इसे ‘बहीखाता’ कहते हैं। पुरोहितों का मानना है कि पहले ‘बहीखाता’ को लिखने के लिए ‘मुनीम’ रखे जाते थे।

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पहले यह खाता-बही मोर पंख से बाद में नरकट फिर जी-निब वाले होल्डर और अब अच्छी स्याही वाले पेनों से लिखे जाते हैं। वैसे मूल बहियों को लिखने में कई तीर्थ पुरोहित जी-निब का ही प्रयोग करते हैं। टिकाऊ होने की वजह से सामान्यतया काली स्याही उपयोग में लाई जाती है। मूल बही का कवर मोटे कागज का होता है। जिसे समय-समय पर बदला जाता है। बही को मोड़कर मजबूत लाल धागे से बांध दिया जाता है।

भटके हुए जजमानों को सही पुरोहितों तक पहुंचाते है करिंदें-:

आज भी संपन्न पंडों के यहां ‘मुनीम’ कार्य करते हैं। यजमानों को पहचान कर निर्धारित पंडों के यहां तक लाने के लिए अलग-अलग जातियों के ‘अनुचर’ रखे जाते हैं जिसें ‘करिंदा’ कहा जाता है। इन्हें निश्चित वेतन के साथ-साथ कमीशन भी मिलता है। यह ‘करिंदें’ स्नान-दान, श्रद्धा या अस्थि विजर्सन के लिए दूर-दराज से आने वाले यजमानों को निर्धारित पंडों के पास पहुंचाते हैं।

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पुरोहितों से जजमान को केवल अपना नाम और स्थान का पता बताने की देरी होती है बस, शेष काम उनका होता है। वह आधे घंटे के अंदर कई पीढ़ियों का लेखा-जोखा सामने रख देते हैं। लाखों लोगों के ब्योरे के संकलित करने का यह तरीका इतना वैज्ञानिक और प्रमाणिक है कि पुरातत्ववेत्ता और संग्रहालयों के अधिकारी भी इससे सीख ले सकते हैं।

हर गोत्र, जाती के पुरोहितों की होती है एक अलग पहचान-:

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कुंभ मेले समेत माघ मेले में पंडों के शिविरों में अलग निशान के साथ झंडे फहराते हैं। तमाम यजमान इन झंडों को देखकर ही उनके शिविरों तक पहुंचते हैं। अलग-अलग प्रतीक चिह्नों के झंडे कई मयाने में महत्वपूर्ण हैं। इसका निर्धारण पंडों के पारंपरिक पहचान से जुड़ा है। यह पहचान राजाओं ने ताम्रपत्रों पर चिह्न् अंकित करके पंडों को सम्मान के साथ भेंट किया था।

आज भी इन सम्मान पत्रों को पंडों के परिजन संभाल कर रखें हैं। वहीं उनका ‘अधिकार पत्र’ है। शुरू में इसकी सीमा राज्य स्तर पर थी, लेकिन जैसे-जैसे पंडों की पीढ़ी बढ़ती गई यह संगठन के रूप में जिला, तहसील, ब्लाक, गांव और अब जाति के आधार पर सीमाओं का क्षेत्र घटकर सीमित हो गया। लेकिन पंडों का प्रतीक चिह्न् सबका पुराना ही है।

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