दो तरह से दफनाये जाते है लिंगायत धर्म के शव, सालों से की जा रही है अलग धर्म की मांग राज्य सरकार ने दे दी मंजूरी

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन जैसे धर्मो से आप सभी परिचित होंगे. मगर अब इतिहास में एक और धर्म के नाम का अध्याय जुड़ने वाला है. जिसके मांग की पहली सफलता मिल चुकी है. जी हां हाल ही में कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा देने का सुझाव राज्य सरकार ने मंजूर कर लिया है.

यह दर्जा नागभूषण कमेटी के सुझाव और राज्य अल्पसंख्यक कानून के तहत दिया गया है. अब इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा जाएगा. जिसके बाद एक और धर्म को क़ानूनी मान्यता मिल जाएगी. आज इस लेख के माध्यम से हम आपको इस धर्म के बारे में परिचित काराते है जिसके बारे में शायद बहुत ही कम लोग जानते होंगे.

शरीर पर गेंद की तरह  इष्टलिंग बांधते लिंगायत

लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म है दक्षिण भारत में प्रचलित एक स्वतंत्र धर्म है. इसकी स्थापना 12 वी शताब्दी मे महात्मा बसवण्णां ने की थी. आज से करीब 800 साल पहले बासवन्ना नाम के समाज सुधारक बासवन्ना थे. उन्होंने जाति व्यवस्था में भेदभाव के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था. वेदों और मूर्ति पूजा को नहीं माना. बासवन्ना के विचारों को मानने वालों को ही लिंगायत कहा जाता है.

लिंगायत अपने शरीर पर गेंद की तरह एक इष्टलिंग बांधते हैं। उनका मानना है कि इससे मन की चेतना जागती है. लिंगायत समाज पहले हिन्दू वैदिक धर्म का ही पालन करता था, लेकिन कुछ कुरीतियों को दूर करने और उनसे बचने के लिए लिंगायत संप्रदाय की स्थापना की गई.

लिंगायत परंपरा में दफ़नाते हैं शव

लिंगायत परंपरा में निधन के बाद शव को दफ़नाया जाता है. दो तरह से दफ़नाने की परंपरा है. एक बिठाकर और दूसरा लिटाकर. दोनों में से किस विधि से दफनाना है. इसका चयन परिवार करता है. लिंगायत परंपरा में मृत्यु के बाद शव को नहलाकर बिठा दिया जाता है. शव को कपड़े या लकड़ी के सहारे बांध दिया जाता है. जब किसी बुज़ुर्ग लिंगायत का निधन होता है तो उसे सजा-धजाकर कुर्सी पर बिठाया जाता है और फिर कंधे पर उठाया जाता है. इसे विमान बांधना कहते हैं. कई जगह लिंगायतों के अलग कब्रिस्तान होते हैं.

वीरशैव और लिंगायत में विरोधाभास

मान्यता ये है कि वीरशैव और लिंगायत एक ही लोग होते हैं. लेकिन लिंगायत लोग ऐसा नहीं मानते. उनका मानना है कि वीरशैव लोगों का अस्तित्व समाज सुधारक बासवन्ना से भी पहले से था. वीरशैव भगवान शिव की पूजा करते हैं. इस विरोधाभास की कुछ वजहें भी हैं. बासवन्ना ने अपने प्रवचनों के सहारे जो समाजिक मूल्य दिए, कालांतर में वे बदल गए. हिंदू धर्म की जिस जाति-व्यवस्था का विरोध किया गया, वो लिंगायत समाज में ही आ गया.

राजनीति में लिंगायत का दबदबा 

कर्नाटक में लिंगायत करीब 14% हैं. इन्हें अगड़ी जातियों में गिना जाता है. 224 सदस्यों वाली राज्य की विधानसभा में 52 विधायक लिंगायत हैं. राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी लिंगायतों की मांग का खुलकर समर्थन कर रहे हैं.

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