एक गांव ऐसा जहां पेट भरने के लिए सिर्फ भात होता है नसीब

डिजिटल भारत आज चाँद और मंगल पर जाने का जश्न मनाता है. मगर देश में ऐसे भी कई जगह है जहां सरकार की कोई सुविधा तो क्या सरकार क्या होती है इसकी भी खबर नहीं होती लोगों को. आज हम आपको ऐसे ही आधुनिक समाज के एक प्राचीन समाज से परिचित करायेंगे.

झारखंड प्रदेश में आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां लोग आदिम युग में जीते है. इनके पढ़ाई-लिखाई क्या चीज होती है इसकी बात तो छोड़ ही दी जाए खाने में सिर्फ चावल के सिवा दूसरा कुछ नहीं पता.

राज्य के पूर्वी सिंहभूम के डुमरिया डिविजन हेडक्वार्टर से करीब 30 और जमशेदपुर से लगभग 60 किमी दूर एक ऐसा ही एक गांव है ‘दंपाबेड़ा’. इस गांव से सटे करीब 4 हजार फीट ऊंचे पहाड़ की चोटी पर बसे हैं लुप्तप्राय आदिम जनजाति के 25 सबर परिवार.

इनके गांव को जंगल ब्लाक कहते हैं. इस पहाड़ पर चार किलोमीटर के दायरे में बसे ये लोग आज भी आदिम युग की तरह जीते हैं. इनका जनजीवन सामान्य लोगों से बिल्कुल अलग है.

मरने से पहले खोद देते है कब्र

सरकार की ओर से सुविधा के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है. इसके लिए इन्हें किसी से कोई शिकायत भी नहीं. ये यहां से कहीं और जाना भी नहीं चाहते. इनकी अलग ही भाषा है जो बांग्ला तथा ओड़िया से मिल कर बनी है. गांव में बाहरी लोग को आना जाना नहीं है. इस गांव में अगर कोई गंभीर रूप से बीमार होता है तो उसके मरने के पूर्व ही दफनाने के लिए कब्र खोद दिया जाता है.

पढ़ाई क्या होती है यहां के बच्चों को कुछ नहीं पता 

गांव में करीब 30 से ज्यादा बच्चे है. पढ़ाई क्या होती है, इन्हें नहीं पता. इनके बाल भी यहीं पर हंसुए से काटे जाते हैं. ये बच्चे दो – दो माह तक नहाते नहीं हैं. चार हजार फीट ऊंचे पहाड़ के नीचे दंपाबेड़ा में स्कूल हैं. पहाड़ से उतरकर रोज स्कूल आना- जाना इनके लिए संभव नहीं है.

कुछ लोग लकड़ी काटकर महीने में एक बार नीचे उतरते हैं और लकड़ी को हाट (बाजार) में बेचकर जरूरत का समान लेकर फिर ऊपर चढ़ जाते हैं. इस गांव तक जाने के लिए पहाड़ी पर कोई रास्ता नहीं. करीब पांच किलोमीटर की सीधी चढ़ाई है. जरा सी चूक हुई तो जान का जोखिम हो सकता है. पत्थरों से पटे तंग इसी रास्ते से सबर जनजाति के लोग अपनी मंजिल तय करते हैं.

पहाड़ी पर ही बूंद बूंद गिर रहे झरना के पानी से गांव वालों का भोजन बनता है और इनकी प्यास बुझता है. यह झरना इनके लिए अमृत के समान है. गांव से दो किमी की दूरी पर यह झरना है. इनका घर लकड़ी का घेरा तथा मिट्टी के लेप का बना होता है. इसी घर में वे गर्मी, बारिश तथा ठंड झेलते हैं. किसी भी घर में दरवाजा नहीं है.

सबर परिवार 100 साल से ज्यादा समय से यहां रहते आ रहे हैं. किसी ने इनकी अब तक खोज खबर नहीं ली है. मीडिया ख़बरों के मुताबिक अब तक कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी यहां नहीं पहुंचा है. माह में एक बार पहाड़ से उतरकर 12 किमी दूर बोमरो पैदल जाकर अनाज लाते हैं.

अनाज खत्म होने पर कंद मूल को पकाकर खाते हैं. इन्होंने आज तक भात के सिवा दूसरा कोई व्यंजन चखा तक नहीं है. केंदुआ पंचायत के युवा मुखिया जामुन सोय ने बताया कि जंगल ब्लॉक गांव में चार टोले है. चामरुगोड़ा, दंपाबेडा, कीताकोचा तथा पांडुसाई.

श्रोत-लाइव बिहार

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