जानिये, कैसे सुषमा स्वराज ने बॉलिवूड को दाऊद के चंगूल से छुड़ाया !

भारतीय लोकशाही का एक वैशिष्ट्य है कि हर सरकार के काल में देश कुछ प्रगती के कदम आगे बढता है.

कदमों की गती कभी धीमी तो कभी तेज रहती है. लेकिन कदम आगे बढ़ते रहते हैं इतना पक्का…!

इसे अल्पकाल सत्ता में रहे देवेगौडा और गुजराल सरकार भी अपवाद नही है.

आज जरूरत से कम लडाकू विमानों से चिंतित हवाईदल में सुखोई जैसे विमान नही रहते तो हमारी अवस्था क्या होती…! यह विमान रशिया से खरीदने का निर्णय देवेगौडा सरकार ने ही लिया था. गुजराल द्वारा पर राष्ट्र द्रोह के मामले में बनाए हुए ‘गुजराल डॉक्ट्रीन’ का प्रभाव अटलजी पर भी था. बाद में चुनके आए हुए तथा सत्ता में ज्यादा देर तक रहे अटलबिहरी वाजपेयी तथा मनमोहन सिंह सरकार के काल में भी कई अच्छे निर्णय लिये गये और कार्यान्वयित भी किए गए. लेकिन होता क्या है, राजकीय ‘जिंगोइझम’ के कारण विरोधी राय के सरकार द्वारा लिए हुए अच्छे निर्णयों को कई बार हम नजरअंदाज करते हैं.

एक निर्णय ऐसा ही था – भारतीय सिनेमा जगत को ‘उद्योग’ का दर्जा देनेवाला.

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‘सिनेमा’ – इस बहुरंगी विविधतापूर्ण देश को ‘जोडनेवाले’ गोंद का काम करता है. उस दृष्टी से यह निर्णय पूरे भारतवासीयों के जीवन पर अप्रत्यक्ष रूप से परिणाम करनेवाला निर्णय रहा है. लेकिन सुषमा स्वराज ने अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के काल में लिये हुए इस निर्णय की ज्यादा तारीफ नही हुई.

इस निर्णयका महत्त्व जानने के लिए भारतीय सिनेमा का अर्थशास्त्र समझ लेना जरुरी है.

बॉलीवुड में हर साल तकरीबन 300 सिनेमा बनते हैं. उसमें से हिट होनेवाले 10-15 के आसपास होते हैं. कुछ बहुत छोटे स्वरूप में चलनेवाले यानि केवल लागत की राशि का खर्चा निपटाने वाले होते हैं. ऐसे तकरीबन 20-25 सिनेमा अच्छे स्वरूप से पैसा कमा लेते हैं. अन्य चित्रपटों का आर्थिक व्यवहार नुकसानी में जाता है. यही चित्र थोडे-बहुत अंतर से तेलगू, मराठी, बंगाली तथा अन्य प्रादेशिक सिनेमा जगत में भी दिखाई देगा. बहुत से उत्साही लोग सिनेमा के ठाठ बाठ को देख के निर्माता बनते हैं. लेकिन इस क्षेत्र की कठीनाईयों को न समझना, दलालों द्वारा फंसाया जाना, सिनेमा वितरण का चक्रव्यूह आदि कारणो से उन पर भिख मांगने की नौबत तक आ सकती है और फिर ऐसे निर्माताओं का दूसरा कोई सिनेमा कभी नही बन पाता.

निर्माताओं के कम होने की तुलना खाली ग्रामीण क्षेत्र के पाठशालाओं से लड़कियों के कम होने से ही की जा सकती है…

अस्सी- नब्बे के दशक में तो ऐसे हजारों निर्माताओं का दिवाला निकलते हुए बॉलीवूड ने देखा है. यह निर्माता सिनेमा निर्माण के लिए तीन पद्धतीयों से पैसा जुटाते थे.

पहला तरीका था, बाजार से, सावकार लोगों से बडे ब्याज पर पैसा जुटाना. यह ब्याज ३६-४० प्रतिशत हुआ करता था. इससे निर्माताओं की स्थिती और भी बेकार हो जाती थी.

दूसरा तरीका राजकीय नेता और धंधेवालों का प्रमुख व्यवहार में न दिखनेवाला काला धन.

तिसरा और सबसे खतरनाक स्रोत था अंडरवर्ल्ड. दाऊद की टोली सिनेमा निर्माण में पैसा लगाने में आगे थी. डॉन पब्लिक को पहले से ही बॉलीवूड और अभिनेता-अभिनेत्रियों का आकर्षण रहता था. दूसरा, इसका परतावा भी अच्छा होता था. डॉन से लिए हुए पैसे समय वर वापस नही किए तो अंजाम बुरे होंगे यह जाननेवाले निर्माता कोई भी रास्ता अपनाकर, फिर चाहे वो गलत क्यों न हो, पैसा समयपर वापस करते थे. बाद में भले ही  सिनेमा चले या न चले.

नब्बे के शतक में बहुत से अभिनेता, निर्माता, दिग्दर्शक दाऊद की दी हुई पार्टीयों में दाऊद से ही घसीट करते वर्तमानपत्र के छायाचित्रों में देश की जनता ने देखे हैं.

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शारजाह में क्रिकेट मैच के दौरान दाऊद के बगलमे बैठने के लिए बॉलीवूड के लोग दौड लगाते थे.

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बॉलीवूड के लोग एक ही समय पर दाऊद के दहशत और उपकार के नीचे दबे हुए थे. बॉलीवूड की आर्थिक स्थिती अपने हाथ में है यह जानने के बाद कई भाई लोगों की आशाओं मे और भी बढत हो गयी. अभी उनको बॉलीवुड पर पूरा वर्चस्व चाहिए था. उसके रास्ते में आनेवाले लोगों को हम आसानी से खत्म कर सकते हैं, ऐसा विश्वास उन्हे था. बॉलीवूड के ही कुछ लोगों की उन्हे साथ थी. इसी मामले में टी-सिरीज के गुलशन कुमार की बेरहमी से हत्या की गई. राकेश रोशन और राजीव राय जैसे अग्रेसर निर्माताओं पे जानलेवा हमले हुए. इसके मूल में बॉलीवुड की अंडरवर्ल्डपर हुई आश्रितता थी.

बॉलीवुड को इस दलाली से बाहर निकालने के लिए एक मसीहा की आवश्यकता थी.

उस मसीहा ने, वाजपेयी सरकार में सूचना तथा प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज के रूप से उभर कर आया.

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स्वराज फिलहाल जिस कार्यक्षमता से विदेश मंत्रालय संभाल रही हैं, उसी उर्जा से उन्होंने वाजपेयी सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का कारोबार संभाला . उन्होंने वाजपेयी के आधार से एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया था. उन्होंने भारतीय सिनेमा जगत को उद्योग का दर्जा प्राप्त कराया. जिससे बैंक तथा बाकी आर्थिक संस्थाओं से चलचित्रों को आर्थिक मदद मिलने का रास्ता खुला. इसके पहले वह दर्जा न होने के कारण बॉलीवुड को पैसा जुटाने के लिए काला धन, अंडरवर्ल्ड जैसे स्रोत देखने पडते थे.

लेकिन स्वराज के इस निर्णय से यह परिस्थिती रातोरात पलट गई.

‘वाजपेयी सरकार ने लिए अच्छे निर्णयों में से एक निर्णय’ ऐसा इस का उल्लेख करना होगा. आर्थिक मदद कायदे से चालू होते ही ‘स्टुडिओ’ सिनेमा निर्मिती में आ गए. विदेशी निवेश चालू हुआ और भारतीय सिनेमा जगत के अच्छे दिन आ गए.

नियमित स्वरूप से सिनेमा जगत का अध्ययन करनेवालों का ऐसा मानना है की सन २००० के बाद अंडरवर्ल्ड और बॉलीवूड के एक दूसरे पर आश्रित रहने का प्रमाण बडी मात्रा में कम हुआ है. बॉलीवुड निर्माताओं पर होनेवाले हमले पूरी तरह से बंद हो चुके हैं. दहशत के दो दशक के बाद बॉलीवूड खुली सांस ले रहा है.

निश्चित रूप से, बॉलीवुड में फिलहाल काला धन या अनैतिक व्यवहार से आया हुआ पैसा बिलकुल भी नही है, ऐसी स्थिती नही है. कुछ आर्थिक गैरव्यवहार जरूर होते हैं. लेकिन भला कौनसा क्षेत्र इससे बचा है? बॉलीवुड में अनैतिक आर्थिक मदद का प्रमाण बडी मात्रा में कम हुआ है, उसका श्रेय सुषमा स्वराज को जाता है. ‘‘बॉलीवूड दाऊद के पैसों पे चल रहा है’’ ऐसा कई बार लेखक लिखते हैं. लेकिन उनके दिमाग में आज भी नब्बे के दशक का दाऊद और अभिनेताओं के फोटो रहते हैं. दाऊद का पैसा होने के कारण खान लोगों को ज्यादा सिनेमा मिलते हैं यह उनकी कल्पना के आगे की उडान होती है. बॉलीवूड तो किसी इंडस्ट्री जैसी एक इंडस्ट्री है और इस में बाकी इंडस्ट्री जैसे सही-गलत बातें हैं!

दुर्भाग्य से… दाऊद के शिकंजे से बॉलीवूड को छुडानेवाला यह अच्छा निर्णय, जैसे ‘लगान’ का सूत्रधार कहता है, ‘इतिहास के पन्नो में कही खो गया…’

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