इस वजह से अटक गया है कांग्रेस-आप का गठबंधन

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दिल्ली में छठे चरण में 12 मई को मतदान होना है. इतना ही नहीं बल्कि मंगलवार से नामांकन पत्र दाखिल करना भी शुरू होगा पर अभी तक दिल्ली मे आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में गठबंधन को लेकर बातचीत जारी है.

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर दिल्ली की सभी सातों सीटों पर जीत की संभावना देखते हुए आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन के प्रयास दोनों तरफ से किए गए.

लेकिन इतने प्रयासों के बावजूद यह संभावित गठबंधन बातचीत के आगे बढ़ता नजर नहीं आ रहा. आज हम यह जानने की कोशिश करेंगे की कहां और क्यों अटक गए है आप और कांग्रेस.

2014 के लोकसभा चुनाव में बड़ी जित हासिल करने के बाद देश के कई राज्यों के चुनावों में भी बीजेपी ने जीत हासिल की. तब ऐसा लग रहा था की, मानो सभी तरफ एक ही लहर छा गई हो.

2014 loksabha poll kuchhnaya

लेकिन उस दौरान दिल्ली विधानसभा में आप ने बीजेपी को धूल चटाई. कांग्रेस की हालत तो उस दौरान बद से बत्तर थी. क्योंकि कांग्रेस को 70 सीटों की विधानसभा में 1 भी सीट नहीं मिली. बावजूद इसके की इसके पहले 15 सालों तक दिल्ली में कांग्रेस की सरकार ही रही.

वहीं आप ने दो तिहाई बहुमत से दिल्ली विधानसभा में जीत हासिल की.

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पर उसके बाद अब तक देश के चुनावी पुल के नीचे से काफी पानी बाह गया है. खासकर पिछले कुछ सालों में हुए उपचुनाव व साथ ही पंजाब, गुजरात, कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव के बाद देश का माहौल बदलने लगा.

इसके बाद हुए मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव ने कांग्रेस में जान फूंकी. वहीं बीजेपी के हार के बाद विरोधियों में सत्ता परिवर्तन की आशा जगी.

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लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सपा-बसपा जैसे स्थानीय पार्टियों ने कांग्रेस को दूर रखा. पर कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देकर कुछ हद तक damge control करने की कोशिश की.

और वैसे भी यूपी में कमजोर हुई कांग्रेस को यह संतुष्टी है की, अगर सपा-बसपा गठबंठन कामयाब होती है तो उसका खामयाजा बीजेपी को ज्यादा भुगतना पड़ेगा.

इसलिए कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण है की, वो यूपी की भरपाई अन्य राज्यों में कर सके ताकि चुनाव के बाद अगर बीजेपी बहुमत से दूर रही तो उसके पास हो सके उतने ज्यादा आकड़े हो.

ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पास किन राज्यों के विकल्प बचते है? क्योंकि ईशान्य भारत में पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य में ममता की तृणमूल कांग्रेस हावी है जिसकी मुख्य लड़ाई बीजेपी के साथ है.

वहीं बिहार में लालू प्रसाद यादव के आरजेडी, महाराष्ट्र में एनसीपी, कर्नाटक में जेडीएस, और तमिलनाडु में डीएमके के साथ गठबंधन है.

ओडिसा में भी कांग्रेस अब उतनी मजबूत नहीं रही. जानकारों की माने तो वहां भी नविन पटनायक के बीजेडी की टक्कर बीजेपी से ही है. ऐसे में ऐसे बहुत ही काम राज्य बचते है जहां कांग्रेस अकेले दम पर लड़ रही है.

यदि हम भारत का मैप देखे तो हमें पता चलता है की, उत्तरी भारत में राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात जैसे बड़े राज्यों के साथ छत्तीसगढ़, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, आसाम, हरियाणा ये वो राज्य है जहां पर कांग्रेस अभी भी अकेले दम पर लड़ने का माद्दा रखती हैं.

लेकिन इनमे से कई ऐसे राज्य है जहां पर लोकसभा की कुल सीटे भी कम है. इसलिए अगर इन राज्यों में भी कांग्रेस यदि किसी पार्टी से गठबंधन करती है तो भविष्य में पार्टी के विस्तार पर मर्यादाएं आ सकती है.

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ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस हाईकमांड को दोहरी चुनौती है. और वह ये की, एक तो एक लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा साटे जितना और दूसरी यह की, भविष्य इन राज्यों के साथ अन्य राज्यों में पार्टी का विस्तार करना.

और सियासी जानकारों के मुताबिक यही ओ असली कड़ी है जो आप और कांग्रेस के गठबंधन के बीच आ रही है. दरअसल इस गठबंधन के सहारे हरियाणा और पंजाब में अपनी जमीन मजबूत करना चाह रही है, जबकि कांग्रेस उसे इन दोनों ही राज्यों में कोई सीट देने को तैयार नहीं है.

क्योंकि आज जिन राज्यों में कांग्रेस अकेले लड़ रही है, उनमे से पंजाब में कांग्रेस की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है. जबकि हरियाणा में भी स्थिति उतनी ख़राब नहीं.

चुकी दिल्ली में कांग्रेस कमजोर है इसलिए वहां आप के लिए 4 सीट छोड़ने के लिए कांग्रेस राजी है. वहीं केवल दिल्ली में गठबंधन को लेकर आप दिलचस्पी नहीं ले रही.

कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर आप इतनी बेक़रार है क्योंकि, 2014 में पंजाब से आप के 4 सांसद चून के आये थे. लेकिन इस बार आप के लिए पंजाब में हालात पहले जैसे नहीं है.

आप का शीर्ष नेतृत्व ये जनता है की, अगर एक बार पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों से आप की सियासी जमीन खिसक गई तो फिर से वापसी करना एक बड़ी चुनौती हो सकती है.

कांग्रेस क्यों कर रही टालमटोल
कांग्रेस में भी इस बारे में दो मतप्रवाह है. एक का मत है की, आप से गठबंधन करना चाहिए. वहीं शिला दीक्षित जैसे नेता इसके खिलाफ है.

हालांकि इस बात का निर्णय अब कांग्रेस अध्यक्ष पर छोड़ दिया गया है. पर क्या दिल्ली के कुछ चंद जगहों के लिए पंजाब और हरियाणा की सीटों पर पानी छोड़ने के लिए कांग्रेस कितनी राजी होगी इस पर ही इस गठबंधन का भविष्य निर्भर है.

इसके आलावा पार्टी के अनुभवी नेताओं का मानना है की, केजरीवाल जैसे हटवादी, महत्वाकांक्षी नेता और उनकी पार्टी के साथ गठबंधन आगे जाकर कांग्रेस के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है.

ट्वीट पर चल रही है गठबंधन की चर्चा?

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने #AbAAPkiBaari हैशटैग के साथ एक ट्वीट किया था. इतने दिनों से चली आ रही कयासबाज़ी पर लगाम लगाते हुए इस ट्वीट में उन्होंने कहा की,
”दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने का मतलब है भाजपा की बड़ी हार. कांग्रेस दिल्ली में आम आदमी पार्टी के लिए 4 सीटें छोड़ने के लिए तैयार है. लेकिन, श्री केजरीवाल ने फिर यू टर्न लिया है. हमारे दरवाजे अब भी खुले हैं, लेकिन वक्त निकलता जा रहा है.”

पर जवाब मे आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने कहा की, ”कौन सा U-टर्न?अभी तो बातचीत चल रही थी आपका ट्वीट दिखाता है कि गठबंधन आपकी इच्छा नहीं मात्र दिखावा है. मुझे दुःख है आप बयान बाज़ी कर रहे हैं. आज देश को मोदी-शाह के ख़तरे से बचाना अहम है. दुर्भाग्य कि आप UP और अन्य राज्यों में भी मोदी विरोधी वोट बाँट कर मोदी जी की मदद कर रहे हैं”

इस पर से अंदाजा लगाया जा सकता हैं की, ये ”ट्विटर पर चर्चा” अगले कुछ दिन तक ऐसे ही चलती रहेगी. पर नामांकन की तारीख नज़दीक आते-आते पार्टियों पर अपना रुख साफ करने का दवाब बढ़ता जाएगा.

लेकिन जानकारों की माने तो कांग्रेस अब अपने दम पर ही लोकसभा चुनाव लड़ने का मन बना रही है.

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