जानिए बॉलीवुड के बाल ठाकरे के बारे में !

पिछले कई वर्षो से महाराष्ट्र के सबसे शक्तिशाली नेता बाल ठाकरे के जीवन पर आधारित फिल्म बनाने की कोशिश की जा रही थी. जो अब साकार हो चुकी है. बहुत जल्द ही देशभर के सिनेमाघरों में फिल्म भी रिलीज हो जाएगी. फिल्म में बाल ठाकरे के अंदाज में किरदार निभाना हर किसी अभिनेता के वश का नहीं था. अब जब फिल्म का ट्रिजर २२ दिसंबर को सामने आ गया तो हर कोई उस अभिनेता के बारे में जानने का इच्छुक होगा की आखिर वो कौन है जो बाल ठाकरे के छवी को पर्दे पर हू ब हू उतार सकेगा. तो जलिए हम आपको बताते है बॉलीवुड के बाल ठाकरे के बारे में….!

Nawazuddin-Siddiqui kuchhnaya
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महाराष्ट्र की सियासी किताब बाला साहेब ठाकरे नाम के चैप्टर के बिना पूरी नहीं हो सकती और मुंबई की कोई भी कहानी बाल ठाकरे के ज़िक्र के बिना अधूरी है. बाल ठाकरे के सियासत करने के तौर-तरीक़ों को लेकर बहस हो सकती है, मगर एक शख़्सियत के तौर पर उनकी उपस्थिति को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. बाला साहेब के निडर, बेबाक़ और प्रभावशाली व्यक्तित्व को सिल्वर स्क्रीन पर उतारने की तैयारी हो चुकी है और इसे अंजाम देने का बीड़ा उठाया है शिव सेना नेता और सांसद संजय राउत ने, जो बाला साहेब ठाकरे की बायोपिक फ़िल्म ‘ठाकरे’ का निर्माण कर रहे हैं. 23 जनवरी 2019 को रिलीज़ होने वाली फिल्म में फ़िल्म में नवाज़उद्दीन सिद्दीक़ी बाला साहेब का किरदार निभा रहे हैं.

नवाजुद्दीन सिद्दीकी

nawaj and bala thakre kuchhnaya

भारत के उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बुढ़ाना गांव में 19 मई 1974 जन्मे नवाज फिल्मी करियर की शुरुआत सन १९९९ में ‘शूल’ और ‘सरफरोश’ जैसी फिल्‍मों से हुई थी लेकिन इन फिल्‍मों में उनका किरदार काफी कम समय के लिए थाा इसके बाद उन्‍होंने कई छोटी-बड़ी फिल्‍मों में काम किया. उनके काम को हर तरफ से काफी सरा‍हा गया लेकिन असली पहचान उन्‍हें ‘पीपली लाइव’, ‘क‍हानी’, ‘गैंग्‍स ऑफ वासेपुर’, ‘द लंच बॉक्‍स’ जैसी फिल्‍मों से ही मिली.

मुजफ्फरनगर से मुंबई तक

nawaj kuchhnaya

नवाज ने एक चैनल के इंटरव्यू में बताया कि मैं उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के छोटे-से कस्बे बुढ़ाना के किसान परिवार से हूं. हरिद्वार की गुरुकुल कांगड़ी यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रेजुएशन किया है. लेकिन छोटे कस्बे की जिंदगी रास नहीं आई तो दिल्ली चला आया. जिंदगी चलाने का जरिया चाहिए था तो मैं चौकीदार तक का काम करने से पीछे नहीं हटा. लेकिन मेरे अंदर कुछ क्रिएटिव करने की भूख थी और कुछ कर दिखाने का जज्बा था. इसलिए मैंने दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला ले लिया और 1996 में वहां से ग्रेजुएट होकर निकले. दिल्ली में मैंने साक्षी थिएटर ग्रुप के साथ काम भी किया, जहां मुझे मनोज वाजपेयी और सौरभ शुक्ला जैसे कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला. लेकिन यहीं से असली संघर्ष की दास्तान शुरू हुई.

माँ की एक बाद ने बनाया कामयाब

इसके बाद मैं मुंबई चला आया और यहां लगातार रिजेक्शन का दौर जारी रहा. मेरे साथ मुंबई आए सभी दोस्त अपने घरों को लौट गए, लेकिन मैं डटा रहा. हताशा के इन दिनों में मुझे अपनी मम्मी की एक बात याद रही कि 12 साल में तो घूरे के दिन भी बदल जाते हैं बेटा तू तो इंसान है.

मेरा संघर्ष जारी था, लेकिन साल 2010 मेरी किस्मत बदलने के इरादों के साथ आया था. इस साल रिलीज हुई आमिर खान प्रोडक्शन की पीपली लाइव ने मुझे मेरी ऐक्टिंग की वजह से सबकी नजरों में ला दिया. साल 2012 में कहानी, गैंग्स ऑफ वासेपुर-1,2, तलाश और पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों ने बॉलीवुड में एकदम अलग किस्म के कलाकार के रूप में मेरी पहचान कायम कर डाली. मेरे लिए खुशी की बात यह थी कि हर साल के साथ कान जाने वाली मेरी फिल्मों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है. 2012 में मेरी मिस लवली, गैंग्स ऑफ वासेपुर-1,2 कान गई थीं तो 2013 में लंचबॉक्स, मॉनसून शूटआउट और बॉम्बे टाकीज ने रंग जमाया. जब भी मेरी फिल्मों का वहां स्टैंडिंग ओवेशन मिलता है तो मुझे मम्मी की कही बातें याद आ जाती हैं. मेरे हौसले और बुलंद हो जाते हैं.

मांझी द माउंटेन मैन, मंटो के बाद नवाज की ठाकरे फिल्म तीसरी फिल्म होगी जो किसी के जीवन पर आधारित बायोपिक होगी.

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