धोनी की हो सकती है गलती..पर आखिर कब तक अम्पायर्स की गलतियों को नजरअंदाज किया जायेगा?

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देश में चुनाव का माहौल है. पर इसके साथ ही आईपीएल का फ़ीवर भी अपने चरम पर है. मगर परसों का एक वाकिया ऐसा भी हुआ, जिसकी चर्चा भी खूब हुई. जी हां हम बात कर रहे है राजस्थान रॉयल्स बनाम चेन्नई सुपरकिंग्ज मैच की.

इस मैच के आखिरी ओवर में हुई घटना से गरमाया हुआ माहौल अब धीरे धीरे सामान्य हो रहा है. इस मैच में ‘कैप्टेन कूल’ नाम से परिचीत महेंद्रसिंह धोनी का रुद्रावतार दर्शकों को देखने मिला.

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हुआ यूं की, आखिरी ओवर में राजस्थान रॉयल्स के बेन स्टोक्स जब बोलिंग कर रहे थे, तब इस ओवर के एक गेंद को जब एक अंपायर ने नो बॉल करार दिया वहीं दूसरे अंपायर ने उस निर्णय को रद करते हुए वो नो बॉल का निर्णय कैन्सल किया. इस बात से नाराज हुए धोनी ने मैदान में आकर अम्पायर से स्पष्टीकरण मांगा.

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इस बर्ताव से धोनी की चारों ओर से कड़ी निंदा की गई. कई पूर्व क्रिकेटरों की राय है कि, दरअसल एक बार आउट होने के बाद किसी भी खिलाडी या कैप्टेन ने इस प्रकार मैदान में आकर अम्पायरों से विवाद करना अनुचित है.

मामला यहां तक ही सिमित नही बल्कि इस हरकत के लिए धोनी के इस मैच के कुल आय से 50 फीसदी रकम का जुर्माना हुआ.

पर इन सब के बीच भारतीय अम्पायरों के ख़राब प्रदर्शन की ओर किसीका ज्यादातर ध्यान नही गया. या फिर मजबूरन कहना पड़ता है कि, इस बात की ओर जानबूजकर नजरंदाज किया जा रहा है. 

राजस्थान बनाम चल रहे इस मुकाबले में अम्पायर उल्हास गंधे ने दिया नो-बॉल का निर्णय दुसरे अम्पायर ब्रुस ऑक्सनफर्ड ने रद किया. आईपीएल के 12 वे मौसम में अम्पायरों ने दिया यह कोई पहला गलत निर्णय नहीं हैं.

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बल्की इसके पहले भी मुंबई इंडियन्स बनाम रॉयल चैलेंजर्स बंगलुरु मुकाबले में अम्पायर एस. रवी ने आखिरी ओवर में लसिथ मलिंगा द्वारा डाले गए नो-बॉल की ओर ध्यान नहीं दिया. और खास बात यह की बिलकुल इसी बॉल पर डिव्हीलियर्स के आउट होने से बंगलुरु को मैच गवाना पड़ा था.

बता दे की, इसके बाद अम्पायरों के प्रदर्शन पर नाराजगी जताते हुए विराट कोहली ने कहा था कि, ‘अम्पायर आंख खोल कर अंपायरिंग करे, यह आईपीएल है कोई क्लब क्रिकेट के मैच नहीं.’ 

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इसके अलावा कई  नो-बॉल, वाईड बॉल केे निर्णय विवादास्पद तरीके से दिए गए. इन वजहों से क्रिकेट फैन्स और आंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय अम्पायर मजाक का विषय बन चुके है.

बताया तो यह भी जा रहा है कि, आयपीएल गवर्निंग काऊन्सिल भी अंपायरों की इस साधारण प्रदर्शन से नाराज है. पर बीसीसीआई के अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया की, बीसीसीआई के पास अनुभवी अम्पायरों की कमी होने के कारण इस प्रकार के विवादस्पद फैसलों के बाद भी उनपर कार्रवाई नही की जा रही.

लेकिन आश्चर्य की बात है कि, दुनिया की सबसे अमीर क्रीडा संगठन होने के बावजूद बीसीसीआई के पास अम्पायरों के प्रदर्शन में सुधार लाने के लिए किसी भी प्रकार की यंत्रणा मौजूद नही है.

गौरतलब है कि, मौजूदा समय में स्थानीय अम्पायरों के लिए बीसीसीआई ने कुछ कड़े कदम उठाये है. पर अम्पायरों के प्रदर्शन को देखते हुए लगता है कि, यह कदम पर्याप्त नहीं है.

और एक बात यह की अम्पायरों का ख़राब प्रदर्शन सिर्फ आईपीएल तक ही सिमित नहीं है! बल्की स्थानीय रणजी मुकाबलों में भी इसी प्रकार विवादास्पद निर्णय दिए गए है. ऐसे मुकाबलों में DRS (Decision Review System) ना होने के कारण खिलाडी तिसरे अम्पायर की ओर भी अपील नहीं कर सकते.

स्थानीय मैचों में भी कई बार खिलाडियों ने अम्पायरों के प्रदर्शन पर नाराजगी जताते हुए मैच रेफरी की ओर शिकायत की है. पर इसपर किसी भी प्रकार की कार्रवाई न होने की वजह से अम्पायरों का प्रदर्शन लगातार ख़राब होते जा रहा है. 

अम्पायर भी इन्सान ही है, इसलिए उनसे भी गलती हो सकती है, इस प्रकार का बचाव कई लोगों की ओर से किया जा सकता है. कुछ पल के लिए यह मान भी लेते है…..पर इसी वजह से आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में DRS (Decision Review System) को लाया गया ताकी अम्पायर के किसी भी फैसले पर यदि खिलाडी सहमत ना हो तो तिसरे अम्पायर की ओर वे अपील कर सकते है.

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इसके अलावा स्वयं अम्पायर भी किसी विशिष्ट परिस्थिति में आश्वस्त ना हो तो वे तिसरे अम्पायर की मदद ले सकते है. एलबीडब्लू जैसे निर्णय देते समय यदि गलती हो तो वो भी समझा जा सकता है. पर आज कल तो सामान्य तौर पर आंखो से पता लग सके ऐसे रनआऊट के निर्णय के लिए भी सीधे तीसरे अंपायर पर निर्भर रहा जाता है.  

कई बार तो किसी भी सामान्य व्यक्ति जो सामने बैठी हो तो उसे भी इस रनआउट का पता लग सकता है. टीवी रिप्ले में खिलाडी कैमरा फ्रेम में भी नहीं होते और स्टंप उड़ गयी होती है. क्या ऐसे समय में भी तीसरे अम्पायर की मदद लेना सही है?

इससे भी चौकाने वाली बात यह की, कैच आउट होने पर बॉलर ने कहीं नो-बॉल तो नही डाला ये देखने के लिए भी थर्ड अंपायर की मदद ले ली जाती है. ऐसे मामलों को कहीं ना कहीं अब रोकना चाहिए.

दरअसल बॉलर द्वारा डाला जाने वाले नो-बॉल को देखना अम्पायर के लिए जरुरी ही नही बल्की उनका काम है. अगर ऐसे फैसलों के लिए यदि थर्ड अंपायर की मदद लेना पड़े तो यह सवाल लाजमी है कि, फिर मैदान पर अम्पायर की जरुरत ही क्या?

क्रिकेट इस खेल को ‘जेंटलमेन गेम’ के तौर पर जाना जाता है…लेकिन इस प्रकार के वाकियों से इस खेल की प्रतिष्ठा मिट्ठी में मिलने की आशंका है. इस वजह से समय के रहते ही बीसीसीआई इस पर उचित करेगी ऐसी आशा करते है.

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